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BADI KHABAR : हाथरस गैंगरेप केस में हुई ब्रेन फिंगरप्रिंटिंग, क्या होती है यह जांच, पढें खबर

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BADI KHABAR : हाथरस गैंगरेप केस में हुई ब्रेन फिंगरप्रिंटिंग, क्या होती है यह जांच, पढें खबर

डेस्क :-

लखनउ l  ब्रेन स्कैन या एमआरआई जैसे टेस्ट्स के बारे में आप सुन चुके हैं. ये सामान्य किस्म के मेडिकल डायग्नोसिस टेस्ट होते हैं, लेकिन ब्रेन मैपिंग यालाय डिटेक्टर  जैसे टेस्ट अक्सर किसी आपराधिक मामले में किए जाते हैं, जिनके बारे में भी आप समय समय पर जान चुके हैं l लेकिन क्या आपने ब्रेन फिंगरप्रिंटिंग के बारे में सुना है? पिछले दिनों सुर्खियों में रहे उत्तर प्रदेश के हाथरस में 19 साल की युवती के साथ गैंगरेप मामलेमें कथित बलात्कार और हत्या के आरोपियों पर यह टेस्ट हुआ l

बीते शनिवार यानी 21 नवंबर को एक सीबीआई टीम हाथरस के इस मामले में जांच के सिलसिले में गांधीनगर बेस्ड फॉरेंसिक विज्ञान लैब में चार आरोपियों के साथ पहुंची. बताया गया कि इन चारों का वो टेस्ट किया गया, जिसे BEOSP या प्र​चलित तौर पर ब्रेन फिंगरप्रिंटिंग कहा जाता है. आरोपियों के मेडिकल टेस्ट के बाद सीबीआई टीम और फॉरेंसिक टीम ने मिलकर केस व पूछताछ प्रक्रिया तैयार की. इन खबरों के बाद इस टेस्ट से जुड़ी काम की बातें जानिए.


तो क्या होता है BEOSP टेस्ट?

एक तरह की न्यूरो मनोवैज्ञानिक विधि है जिसे किसी आपराधिक मामले में आरोपी पर अपनाकर पता किया जाता है कि जवाब देते वक्त उसके ब्रेन यानी मस्तिष्क में किस तरह के रिस्पॉंस मिलते हैं. मानवीय मस्तिष्क के इलेक्ट्रिकल बर्ताव को समझने के लिए इस टेस्ट को इलेक्ट्रोएनसेफलोग्राम प्रक्रिया के ज़रिये पूरा किया जाता है.

कैसे होता है यह टेस्ट?-

सबसे पहले इस टेस्ट के लिए आरोपी की रज़ामंदी ली जाती है. फिर, जिसका टेस्ट किया जाना होता है, उसके सिर पर कई इलेक्ट्रोड लगी एक टोपी लगा दी जाती है. आरोपी को अपराध से जुड़े वीडियो या आवाज़ें सुनाई जाती हैं और इस दौरान उसके ब्रेन में पैदा होने वाली तरंगों व न्यूरॉन्स को समझा जाता है. इस टेस्ट से मिलने वाले डेटा के बाद स्टडी की जाती है कि आरोपी किस तरह अपराध में शामिल रहा.

लाय डिटेक्टर से कैसे अलग है यह टेस्ट?

इस टेस्ट में आरोपी से सवाल जवाब नहीं किए जाते बल्कि न्यूरो मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है. पॉलीग्राफ टेस्ट या लाय डिटेक्टर टेस्ट में ब्लड प्रेशर, धड़कन की रफ्तार, सांस और त्वचा में होने वाली हरकतों जैसी शारीरिक गतिविधियों या रिस्पॉंस दर्ज किए जाते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि मुश्किल समय में भी कोई व्यक्ति अपने बीपी या पल्स रेट को कंट्रोल कर सकता है इसलिए  टेस्ट को ज़्यादा प्रामाणिक माना जाता है.

क्या इस टेस्ट के नतीजे सबूत माने जाते हैं?

क्या अदालत में इस टेस्ट को बतौर सबूत पेश किया जा सकता है? इसका जवाब है कि इन टेस्ट रिपोर्ट्स को स्वतंत्र रूप से सबूत नहीं माना जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य केस में कहा था कि नारको एनालिसिस, पॉलीग्राफ और ब्रेन मैपिंग जैसे टेस्ट्स अव्वल तो बगैर रज़ामंदी के करवाए नहीं जा सकते और इनके नतीजे स्वतंत्र रूप से सबूत नहीं माने जा सकते. हां, ये किसी तथ्यात्मक प्रमाण या सबूत के हिस्से ज़रूर हो सकते हैं 

गांधीनगर लैब में क्यों हो रहे हैं टेस्ट?

आखिर में यह भी जानिए कि हाथरस केस में ब्रेन फिंगरप्रिंटिंग के लिए आरोपियों को गांधीनगर की फॉरेंसिक लैब में क्यों ले जाया गया. फॉरेंसिक विज्ञान और तकनीकी जांच के लिए यह देश की शुरूआती और बड़ी लैब रही है. यहां 1100 स्टाफ हैं और यहां कई तरह के विशेष और एडवांस टेस्ट की सुविधाएं हैं. 'गाय के मांस' संबंधी टेस्ट भी यहां होते रहे हैं. गुजरात के 33 ज़िलों में फॉरेंसिक मोबाइल वैन चलती हैं, जो मौका ए वारदात से नमूने लेकर इस लैब तक पहुंचाने का काम करती हैं l


एनसीआरबी डेटा के मुताबिक इस लैब में 2019 में 69636 केसों में फिंगरप्रिंट टेस्ट हुए, जो देश में किसी अन्य लैब के मुकाबले सबसे ज़्यादा रहे. इस लैब के डेटाबेस में 21 लाख से ज़्यादा फिंगरप्रिंट रिकॉर्ड हैं. निठारी सीरियल किलिंग, आरुषि हत्याकांड, गोधरा ट्रेन अग्निकांड, शक्ति मिल गैंगरेप केस और हाल में चर्चित बॉलीवुड ड्रग्स जैसे तमाम हाई प्रोफाइल मामलों में जांचें इस लैब में हुई हैं l


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