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Happy Mothers Day 2017: जानिये क्या वाकई हमें मदर्स-डे की है जरूरत

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Happy Mothers Day 2017: जानिये क्या वाकई हमें मदर्स-डे की है जरूरत

डेस्‍क :-

हम भी अजीब ही हैं। जिस मां के साथ हम पलते हैं। बढ़ते हैं जिसके साथ हम 24 घंटे रहते हैं। साल में एक दिन उसे ही हमें कहना पड़ता है मम्मा आई लव यू। हैप्पी मदर्स डे मां। पहली बात तो यह कि हमें यह सब कहने की हिम्मत नहीं होती है। पता नहीं क्यों। शर्म है या क्या है। पता नहीं। लेकिन अगर कभी यह कह भी दिया तो मां को भी बड़ा अजीब-सा लगता है। सोचती है कि अब ये क्या है। या फिर आज उसके बच्चे को उससे क्या चाहिए।

हम भी अजीब ही हैं। जिस मां के साथ हम पलते हैं। बढ़ते हैं जिसके साथ हम 24 घंटे रहते हैं। साल में एक दिन उसे ही हमें कहना पड़ता है मम्मा आई लव यू। हैप्पी मदर्स डे मां। पहली बात तो यह कि हमें यह सब कहने की हिम्मत नहीं होती है। पता नहीं क्यों। शर्म है या क्या है। पता नहीं। लेकिन अगर कभी यह कह भी दिया तो मां को भी बड़ा अजीब-सा लगता है। सोचती है कि अब ये क्या है। या फिर आज उसके बच्चे को उससे क्या चाहिए। 

करीब एक दशक पहले तक देश की हवा में मदर्स-डे कहीं नहीं था। वैलेंटाइन-डे की तरह यह भी हम पर छा रहा है। धीरे-धीरे ही सही। इसमें क्या गलत है और क्या सही है। मुद्दा यह नहीं है। मुद्दा यह है कि इसे मनाने की जरूरत ही आखिर क्यों पड़ रही है।
हमारे देश में क्यों नहीं मनाया गया

हजारों वर्षों की संस्कृति वाले इस देश में सैंकड़ों तीज-त्यौहार मेले और पर्व हैं। लेकिन कभी किसी समाज और संस्कृति को कोई मदर्स-डे या फादर्स-डे मनाने की जरूरत महसूस नहीं हुई। क्यों नहीं। क्या हमारे पुरखे बेवकूफ थे या नासमझ या अज्ञानी। अगर ये सब नहीं था तो ऐसे पर्व मनाने की जरूरत क्यों नहीं पड़ी। और पश्चिम देशों में ही ऐसा क्यों हुआ।

पश्चिम में नहीं बचा परिवार
यह एक बड़ा सवाल है। जिसे समझने की जरूरत है। पश्चिमी देशों में परिवार नहीं है। समाज नहीं है। परिवार की स्थिति यह है कि पुत्र या पुत्री को पता नहीं होता है कि उसके कितने पिता हैं। मां अगर है तो वो या तो कई शादी कर चुकी होती है जिसके कारण बच्चे अक्सर अपने आपको अनाथालय में पाते हैं। विख्यात एप्पल कम्पनी के संस्थापक स्टीव जॉब्स को उनकी मां ने अनाथालय में छोड़ दिया था। ऐसे बहुतेरे उदाहरण हैं। वहां अगर एक ही माता-पिता हैं तब भी रिश्तों में गर्माहट इतनी खत्म हो चुकी है कि बच्चों के आशियाने में अक्सर मां-बाप को जगह नहीं मिलती है।

सभी डे छुट्टी वाले दिन ही
इसी सांकेतिक गर्माहट को बचाए रखने का नाम मदर्स-डे और फादर्स-डे है। अब यहां भी पेच देखिए। मदर्स-डे हर साल मई महीने के दूसरे रविवार को मनाया जाता है तो फादर्स-डे जून महीने के तीसरे रविवार को। यानी छुट्टी वाले दिन। साल में एक दिन समय निकालना है तो वह भी छुट्टी वाले दिन ताकि कामकाजी बच्चों को कोई दिक्कत न आए। और वे दूर अपने माता-पिता से जाकर मिल सकें। जिस समाज और संस्कृति की यह हालत हो कि वहां माता-पिता अपने बच्चों से रिश्ते को बचाए रखने के लिए 'डे' मनाने पड़ें तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इस तरह की चीजों को आंख-मूंदकर अपनाना हमें कहां ले जाकर खड़ा करेगा।


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