NEWS: साधु संत किसी गच्छ समुदाय के नहीं पूरी मानव जाति के कल्याण के लिए है - जिनवल्लभ विजयजी महाराज

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NEWS: साधु संत किसी गच्छ समुदाय के नहीं पूरी मानव जाति के कल्याण के लिए है - जिनवल्लभ विजयजी महाराज

नीमच :-

साधु संत किसी गच्छ समुदाय के नहीं वे तो पुरी मानव जाति के कल्याण के लिए होते है उनकी सेवा का क्षेत्र व्यापक होना चाहिए गुरू आराधना के लिए होते है किसी समुदाय वर्ग के नहीं होते है साधु जीवन में राग द्वेश का कोई स्थान नहीं होता है साधु जीवन तपस्या कर प्राणी मात्र के कल्याण के लिए महत्वपूर्ण होता है सभी साधु संतों का लक्ष्य एक होता है मार्ग अलग-अलग हो सकते है

यह बात आराधना भवन में मंगलवार सुबह मुनि जिनवल्लभ विजय महाराज ने कही वे ष्वेताम्बर जैन समाज द्वारा आयोजित चार्तुमास धर्मसभा में बोल रहे थे । महाराज श्री ने कहा कि पुण्य कर्म व गुरू कृपा बिना ज्ञान नहीं मिलता है और ज्ञानबिना मोक्ष भी नहीं होता है धर्म अनुमोदना का पुण्य धर्म का लाभ मिलता है भवना निश्पक्ष होना चाहिए । गुरू की भूल धर्म को दिर्घकाल तक प्रभावित करती हे सामायिक प्रतिक्रमण में एकाग्रता होनी चाहिए । पुरूश नौकरी पेषा के कारण धर्म में कम समय दे पाते है तो कोई बात नहीं कर्म धर्म भी करे तो उसका भी पुण्य तो मिलेगा इसलिए गृहणि महिलाएं, माता, बहनों बहुओं को घर में समय है तो वे अधिक धर्म साधना तप करे तो उन्हें पुरूश रोके नहीं उनकी अनुमोदना करें तो महिलाओं के धर्म के पुण्य का आधा लाभ पुरूश को भी मिलता है पर्यूशण में 8 दिन तपस्या करना चाहिए । पुरूश पत्नी को धर्म नियम संयम पालने से नहीं रोके । तो यह समझदारी है कोई भी परिवार जन किसी भी माॅं बहन, बेटी को तप संयम धर्म पालन करने से नहीं रोकना चाहिए परिवार में प्रेम वात्सल्य तपस्या में कमी नहीं आना चाहिए ।

जवानी के जोष में समय पर अंकुष होता है तो जीवन का कल्याण होता है प्राचीन काल में जवान युवतिया षाम 5 बजे बाद घर छोड़कर कहीं नहीं जाती थी आज जा रही है इसलिए युवा वर्ग प्रेम विवाह की तरफ बढ़ रहे हे समाज किस गलत दिषा में जा रहा है सद्गुरू मिलना वर्तमान में कठिन है समाज की इस दषा पर चिंतन कर सुधार करना होगा । साधु संतों को सिर्फ पुण्य का उपदेष देना होता हे संयम नियम तप स्वेच्छा से करना चाहिए ।

प्राचीनकाल में जर्बदस्ती दीक्षा संयम होता तो भी कल्याण हुआ था आजकल जर्बदस्ती दीक्षा तप संयम नहीं होता है विवाह दो षरीर का मिलन नहीं है विवाह वास्तव में दो आत्माओं का मिलन होता है आज विवाह में लोग लड़की का रंग देखते हे चमड़ी का रंग तो चमार देखता है लम्बाई तो खिलाड़ी के लिए देखते हे लड़की का गुण संस्कार से परिवार में परिवर्तन आता हे महाराज श्री ने राजा भरत चक्रवती के धार्मिक जीवन चरित्र के वर्तमान परिपेक्ष्य का महत्व प्रतिपादित किया श्रवण-श्राविकों ने सामुहिक गुरूवंदना कर मंगल आर्षीवाद ग्रहण किया । ट्रस्ट अध्यक्ष अनिल नागौरी सचिव पारस लसोड़ ने धार्मिक कार्यक्रमों की कार्य योजना पर प्रकाष डाला ।    
 


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