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HISTORY OF KARBLA : पढ़िए, ऐसी जंग जिसमे इन्सानियत, मज़लूमियत, भूख और प्यास को शहीदाने कर्बला ने अपना हथियार बनाया, बता रहे है प्रोफ़ेसर ईसा भाई बोहरा

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HISTORY OF KARBLA : पढ़िए, ऐसी जंग जिसमे इन्सानियत, मज़लूमियत, भूख और प्यास को शहीदाने कर्बला ने अपना हथियार बनाया, बता रहे है प्रोफ़ेसर ईसा भाई बोहरा

नीमच :-

लेकिन रही न ताब शहे मशरकेन को
जब हुरमते हरम ने पुकारा हुसैन को

जिस रात में आपने मदीने से सफर इख्तयार किया वह बहुत ही गैर मामूली हालात थे। हूकूमत यजीद की थी, धीरे-धीरे दौलत, लालच, डर और इकतीदार की वजह से जहन खरीदें जा रहे थे। और रसूल के कब्ल का जमाना लौटने की दस्तक दे रहा था। तमाम कुर्बानियों के रायगा जाने का डर था। और सबसे ज्यादा उस मिशन को बचाने की जरूरत थी जिसमें आने वाले मुस्तकबिल की बक छुपी हुई थी। एक हिजरात हुजूर ने मक्का से मदीने के तरफ की थी, आपकी हिफाजत के लिये आपका बिस्तर,सुना नही था, आपके एहलेबेत महफूज थे, पर वाहरे सितम ज़रीफी इमाम हुसैन अ.सा. की हिजरत एक ऐसा वाक्या था जिसके मुस्तकबिल में पूरे काफले की तबाही छुपी हुई थी। इन तमाम बातों का ध्यान करके आपने अपने काफले को तैयार किया। जाहिर मे काफले में बुढे थे, बीमार थे,शीरख्वार थे और सेदानियां थी, लेकिन हकीकत में ये काफला नही था। एक ऐसा मजबूत लश्कर था जिसके जरिये आपको यजीदी ताकतो को कयामत तक के लिये शिक्शत देना थी।

आपने एक हसरत भरी निगाह के दरों दिवार पर डाली, उसके गली बाजारों को देख, अपने घर को देखा और अपनी लाडली बेटी फातेमा सुगरा के आंसू पोछकर रूखसत ली। मदीने ने अलविदा कहा, नाना के मजार ने, माँ के मजार ने, भाई के मजार ने, मस्जिदें नबवी ने सबने आपको अलविदा कहा सभी जानते थे आप इस सफर लौटकर नही आयेगें। बडे बकार एहतेमाम और इन्तजाम के साथ शहजदीयों को महमिलों में सवार कराया गया और नबी के फरजनदो की देखरेख में ये रूहानी काफिला मक्का की तरफ सतराह रजब 59 हिजरी की शाम को दर्द भरे माहौल में रवाना हुआ। इस शाम का जिक्र बहुत ही मुश्किल है- 

हक से सवाल ए बेअते, जुल्मों जफा की रात,
कुफरो निफाक वा हीलवो मकरो दगा की रात। 
घर में वतन में फितनये,सब्र आजमा की रात,
पहले पहल मदीने में,वो करबला की रात।
शब्बीर ने हयात की जुल्फे सँवार दी,
उस रात से भी सुबह की किरणे उभार दी।
नेजे पे और सिनये अकबर पे है नजर,
तीर और गुलूये नाजूके असगर पे है नजर।
ताराजिये खयाम के मंजर पे है नजर,
जैनब के सर बतुल की चादर पे है नजर।
क्या जाने क्या निगाह में आलम समाये है,
कोहला सा एक लिबास भी शब्बीर लाये है।
हिजरत में जो बिछा था वो बिस्तर भी साथ है,
रोजें मुबाहिला कि वो चादर भी साथ है।
इन्सानियत का फख बडा कर चले हुसैन,
इन्सान का जगीर जगा कर चले हुसैन। 

रास्ते में हर जगह बहुत ही अदब के साथ सब पेश आते थे आपका मर्तबा,मकाम और आपके हक का सभी को पास था। मक्का के जवार में आप इसी शान से दाखिल हुवे। मक्का जो दारूल अमन था,जहॉ पर खुदा का घर आबाद है, जहां पर हुजूर के असहाब बडी तादात में मौजूद थे। आप मक्का शरीफ में करीब चार महिने मुकिम रहे इसी दरमियान यजीद की बदमिजाजियों की खबर मुसाफिरों की जबानी खुतुत के जारिये आपको मिलती रहती थी। मुसलमान आपके पास आते और गुजारिश करते कि किसी तरह अपने नाना के मकसद की हिफाजत किजिये। आप बहुत फिक्र मंद हुवे हज का जमाना जैस-जैसे करीब आता गया मक्का में मुसलमानो का इज्तिमा बढता गया। आपको यह भी खबर मिलने लगी के हाजीयों के लिबास में बदनियती से यजीदी दाखिल हो चुके है, आपने अपने चचा अकील के शहजादे मुस्लिम को कुफा की तरफ जायजा लेने के लिये रवाना किया। वहॉ मुस्लिम का शानदार इस्तिकबाल हुआ, मुस्लिम ने आपको इत्तिला दी कि बहुत बडी तादाद में मुसलमान आपके साथ है। 

इस दरिमयान आपको तहकीक खबर मिली के मक्का में आपके कत्ल की साजिश के तहत् बहुत से यजीदी लश्करी दाखिल हो चुके है। इमाम ने मौके की नजाकत को पहचाना और आठ जिलहज 59 हिजरी को जब पूरा आलमें इस्लाम हज का एहराम बांध रहा था, आपने हज के एहराम को उमरे के एहराम में तब्दील कर मक्का से सफर शुरू किया। शायद तारीख में यह अकेला ऐसा वकया है जब कोई मुसलमान हज के रोज मक्का से रवाना हुआ हो हुसैन पर क्या गुजरी होगी, काबे पर क्या गुजरी होगी, तसव्वूर ना मुमकिन है।

 जैसे किसी ने छिन लिया दिल के चैन को,
 काबे ने यू विदा किया है हुसैन को

हालात इतने बद्तर थे के आज तक किसी मौरिख ने ये सवाल नही किया कि कम से कम हुसैन को हज तो अदा करना था, लेकिन हुसैन अ.सा. जिन्होने पूरी उम्र साजिशो को अपनी आंखो से देखा था नही चाहते थे के जिस तरह आपके बडे भाई इमान हसन अ.सा. को जहर दिया गया मगर आज तक किसने जहर दिया पता नही। आपके वालिद को मस्जिद में कत्ल कर दिया गया लेकिन असली कातिल पर पर्दा पडा रहा। आप नही चाहते थे कि साजिशो का सिलसिला चलता रहे इसलिये आपने अपनी शहादत की जगह उस मैदान को चुना जहां पर कारियों के समाने, हाजीयों के सामने, मुसलमानों के सामने दिन की रोशनी में कत्ल किया जाए ताके कातिल को भी यह मालूम हो की जिसको कत्ल किया जा रहा है वो नवासा ये रसूल है, उनका इमाम है, जो मासूम है कातिल उनका हसब-नसब जानता है इसलिये आपने मक्का से ऐन हज से मौसम में इराक की तरफ सफर इख्तयार किया। रास्ते में एक मकान पर खबर मिली कि आप के भाई मुस्लिम कुफा में अपने दो मासूम शहजादों के साथ शहीद कर दिये गये। यह पहली शहादत थी, पहली दरिंदगी थी। मौहज्जीब कोमें सफीर के साथ इज्जत से पेश आते है। 

इस सदमें के साथ आप आगे बढ रहे थे आपको फरज़दक शायर की जुबानी मालूम हुआ कि आपको कही भी अमान ही है। हुसैन जानते थे कि यजीद को शकिस्त देना असलियत में यजीदीयत को खत्म करना है। इसलिये आपने तलवार को अपना हथियार नही बनाया। अखलाक को, इन्सानियत को, मजलमियत को, भूख को, प्यास को, बच्चों को, गोहर को और चादर को अपना हथियार बनाया। 

यजीदी लश्कर से पहला मुकबला रास्ते में हुर के प्यासे लश्कर से हुआ। अगर आप चाहते तो उस लश्कर को वही खतम कर सकते थे। मगर आपने अपने बाबा के नक्शे कदम चलते हुए सिफ्फेन की तरह जो पानी अपने पास था इन्सानी फर्ज समझकर पहले प्यासे लश्कर की प्यास बुझाई, जानवारों तक को सेराब किया। 

रहमों ईसार का पेकर था,मोहम्मद का पिसर,
दुश्मनों को भी पहुँचने ना दिया,जिसने ज़रर।
जाँ बलब लश्करें हुए प्यास से आया जो नज़र,
मश्क खुद लेके बढा,साकिए कोसर का पिसर। 

और फिर नमाज अदा की। नमाज के बाद हुर ने अपना मकसद बताया और आपके काफिले को चारों तरफ से हिरासत में ले लिया। हुर ने इस हिरासत से लेकर आशूर तक तमाम हालात का जायजा लिया कौन हक पर है, कौन हक पर नही है, कौन मजलूम है, कौन जालिम। गरज जब इमाम ने आखरी खुतबा अदा किया, उस वक्त हुर ने तमाम आराम और आशाईस को ठोकर मार यजीदी लश्कर से निकल प्यास से भूखे लश्कर की तरफ हाथ बांध कर रवाना हुवे। मकसदे हुसैन की यह पहली फतह थी जिसको यजीदी फौज हसरत से देखती रही। 

हुर इमाम की खिदमत में हाजिर हुवे अपनी गलती पर शर्मिदा और नादिम थे। इमाम ने अब्बास को दरवाजे पर इस्तकबाल के लिया भेजा आपने भाई कहकर मुखातिब किया, जैनब ने सलाम भेजा और हुर को हमेशा-हमेशा के लिया आजाद कर दिया। हुर मैदाने करबला में सबसे पहले शहीद है। आप एक जबरदस्त बहादुर थे भयानक कारजार हुआ। अरब के कानून के मुताबिक एक एक से जंग हुई, लेकिन जब कामयाबी नही हुई तो यजीदी लश्कर अपने सभी सिपेहसालारों के साथ हुर पर टूट पडी। कहा तक मुकबला करे आखिर हुसैन का यह सिपाही करबला की तपती जमीन पर आखरी सांसे लेने लगा और हमेशा-हमेशा के लिये यह पैगाम दे गया के कोई भी हालात हो साथ हमेशा हो साथ हमेशा हक का देना चाहिए। 

इमाम को जब खबर हुई आप अपने एहल के हमराह हुर की लाश पर तशरीफ लाये, फरमाने लगे अब्बास मेहमान कि करामत नही हो सकी। ऐ हुर मेरा सलाम लो। ऐ हुर हुसैन पर तुम्हारा ऐहसान है। ऐ हुर इस्लाम हमेशा तुम्हे याद रखेगा। हुर का मतलब ही आजादी है। हुर ने हमेशा-हमेशा के लिये जुल्म से आजादी दिला दी। 

हुर को जब इरफाने जाते,शाह हासिल हो गया,
अपनी जंग आलूद शाख्सियत का,कातिल हो गया।
सर झुका कर हुर गया,शब्बीर के कदमों के पास,
सर उठाकर खुल्द की,सरहद में शामिल हो गया।

 जारी ...... 24 सितम्बर के अंक में 


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