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HISTORY OF KARBLA : पढ़िए खत के ज़रिये कैसे हुआ कर्बला में जंग का एलान, बता रहे है प्रोफ़ेसर ईसा भाई बोहरा 

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HISTORY OF KARBLA : पढ़िए खत के ज़रिये कैसे हुआ कर्बला में जंग का एलान, बता रहे है प्रोफ़ेसर ईसा भाई बोहरा 

नीमच :-

काफला जैसे-जैसे आगे बढ रहा था खतरात में भी इजाफा हो रहा था। इमाम मुतमईन नफ्स तमाम हालात का जायजा लिये सहमे हुए बच्चों और मसतुरात के साथ एक ऐस बयावानरात में मैदान में तशरीफ लाए जहाँ आपका घोड़ा चलते-चलते रूक गया। शायद बेजूबान घोडे ने अपने सवार की मंजिल पहचान ली। आपने जगह के मुताल्लीक दरयाफ्त किया। एक बुर्जुग की जुबानी मालूम हुआ इस सहरा का नाम करबला है। आपने यहां पर जमीन खरीदी और हुक्म दिया की मुनासिब जगह इस खैमे नस्व किए जावे। इन्तजाम की बागडोर अब्बास अ.सा.पर थी। आपने जायजा लिया और फुरात के किनारे खैमे लगाने का फैसला किया। हुसैन की आँखे डबडबा गई। बहुत ही ऐहतराम स ेनबी तादिया महमिलों से नीचे उतरी और अपने-अपने खैमों में तशरीफ ले गई।

जब आप करबला तशरीफ लाये आपके साथ एक मुख्तसिर सा लश्कर था,जिसमें दोस्त थें,जानिसार थे,ऐहलेबेत थे,हर शख्स अपनी जगह एक मुकम्मल मुजाहिद और आपके मकसद की ताबिर था। इमाम ने मुस्कराकर सभी को खिताब किया और इशारों में मुबारक बाद दी। ऐ जाबाजो जिस वक्त का इन्तजार था,जिस जगह की तलाश थी,जिस जद्दो जहद के लिये वतन छोडा था वो सब करीब है। 

आप खेमों में तशरीफ ले गये तमाम मसतुरात को मुतमईन,बच्चों पुरसुकून और जवानों के चेहरों पर एक नूर देखा। ऐसा मंजर था जहां कुछ न कहते हुए भी सभी बयान कर दिया। जिस काम के लिये निकले थे मकसद सबको अया था, अन्जाम सबको मालूम था। हर फर्द अपने तौर पर पूरी तरह तैयार था मौत जैसे मकसदे हयात बन थी। आपने अगर नही पाया तो डर,खौंफ और परेशानी हरेक की आँख खुशी के आँसू से डबडबा गई। और नम आँखों से सभी ने इमाम को मकसद की कामयाबी के लिये पूरा भरोसा दिया। इस ताकत के साथ इमाम खैमें से बाहर तशरीफ लाये और एक लम्हां ख्यालों में खो गये। 

नाना का जमान है,नाना का प्यार,शफक्कत याद करते-करते तारीख की कितनी ही मंजिलों से गुजर कर आपको कोल याद आया। हुसैनो मिन्नी व मिनल हुसैन यह नाना ने क्या दिया ये तोर। उम्मीदें मेरी जात से वाबस्ता कर दी, अब जो नाना का काम वो नवासे का काम, अब जो नाना को करना चाहिए, नवासे को करना चाहिए, अब अगर मुझ पर हमला हो रहा है नाना पर हमला हो रहा है। हुसैन ने महसूस किया यह बहुत पुरानी साजिश है। इसकी जडे तूलूए- इस्लाम के पहले के हालात हैं इसलिये नाना मुझसे उम्मीद लगाये बैठे है। काम बहुत ही अहम् नाजूक और जरूरी है। नतीजा ऐसे निशान छोडेगा जिसके असरात कयामत तक कायम रहेगे। साजिश को ऐसी शकिस्त मिलेगी, बातिल कभी मुंह दिखाने के काबिल नही रहेगा। जैहाद किया। बद्र, औहद, खैबर, सिफ्फेन, हुनैन, जमल सभी जगह बालि मुख्तलिफ शक्लों में जंग के इरादों के साथ मैदान में आया जैहादी अन्दाज में मुकाबला हुआ। बातिल कामयाब नही हुआ। लेकिन उसकी पूरी तरह शकिस्त भी नही हुई हमेशा नये अन्दाज में नई ताकत के साथ बातिल सामने आया। अब बातिल की नुमाइन्दगी यजीद कर रहा था। यजीद ने जंग का ऐलान एक खत के जरिये किया जो आपको मदीने के आमिल वलीद के जरिये मिला, बेयत का मुतालेबा था। आपने वलीद से कहा इस खत का करबला में दिया जायेगा जवाब आपने अपनी तैयारी का जायज लिया जंग नही जैहाद था जैसी थी जंग वैसा ही सामान साथ है। 

यजीद की ताकत के सामने आपनी ताकत को देखा परखा और तौला हर लिहाज से आप ताकतवर थे। अब चूकि नाना ने मुकम्मल एतेमाद किया है बातिल को ऐसी शकिस्त देनी है के कयामत तक सर ना उठा सके। अब न तो वो चेहरे पर नकाब डाल सकेगा ना रंग बदल सकेगा। दुनिया खुलकर देखेगी की इस्लाम किया और बातिल क्या। यजीद ने ऐलाने जंग करे आपको मौका फराहम कर दिया। आप भी तैयारी के साथ उस जगह पर आ गए जो आपकी चुनी हुई थी उस दिन को मुकाबला किया जो आपने चुना उस अन्दाज पर मुकाबला किया जो आपका था। करबला कोई मामूलो सहरा नही है। अजल से इस बयाबान की तैयारी हो रही थी, अक्सर अम्बिया यहां तशरीफ लाये। शायद मशीयत को भी यही मन्जूर था की अम्बिया कराम यहॉ तशरीफ लाए और दश्त की एहमियत को समझे और जो कारनामा अन्जाम होने वाला है। उसकी पैशगी जानकारी ले शायद! इसलिए

हुसैन इब्ने अली की बेगुनाही को बताना था। 
हर एक पेगम्बर से इम्तिहान लेना एक बहाना था। 

यजीद इस्लाम को सिरे से खत्म करना चाहता था। आपने बहन जैनब की चादर से उसकी हिफाजत की। यजीद इस्लाम की सूरत बिगाडता चाहता था। आपने सकीना के गौहर से उसकी जैबाईश की। यजीद इस्लाम को तितर-बितर करना चाहता था। आपने सैयदे सज्जाद की बेडी से उसको बिखरने से बचाया। यजीद अपनी हूकुमत मजबूत करना चाहता था। आपने हूकूमत को ठोकर मारकर इस्लाम को बचा लिया। यजीद लालच देकर दिल खरीदना चाहता था। आपने प्यासे रहकर हमेशा के लिये दिलो पर राज कर लिया। यजीद आलमगीर बनना चाहता था, आपने सर देकर यजीद और यजीदीयत को ऐसी शकिस्त दी 

तासिर देख खूनै गूलूए शहीद की। 
तारीख को तलाश है बकरे यजीद की। 

यजीद आपको और एहलेबेत को रूसवा करना चाहता था और इस तरह मजबूर करना चाहता था कि दुनिया में कहीं आंसरा ना मिलें मगर! लूटा के घर को हर एक घर पे कर लिया कब्जा यजीद आपको बेइज्जत करना चाहता था, मगर! खुदा दे जिसको इज्जत उसकी रूसवाई नही होती यजीद आपके मजबूर करना चाहता था, मगर! आपने बताया कि सब्र इख्तियार है मजबूरी नही। रूहानी ताकत हमारे पास है हमारे लिये जन्नत से लिबास आया है। नाना ने कांधे पर सवार किया है, जिबरईल ने मेरा झूला झुलाया और मेरी माँ की चक्की पीसी है। अभी अगर मैं चाहूं तो पानी और खाना सब हाजिर हो सकता है। इसलिये इसको मेरी मजबूरी ना समझ ये तो मेरी कामयाबी और तेरी तबाही के लिये जरूरी है। 

जमाना सब्र को मजबूरियों का नाम ना दे,
हुसैन प्यासे रहे रख कर कुव्वते एजाज। 
ये जो असगर के लिये मांग रहा है पानी,
माने ठोकर तो सभी चश्मए कौसर निकलें। 

और दुनिया पहेली मरर्तबा आपने एक मिसाल पेश की अगर मकसद बातिल का मिटाना हो और हूकुमत ना हो तो सामने कितनी भी ताकतवर हूकूमत हो उसका मुकबला ऐसे हथियारो से करों के बातिल हमेशा हमेशा के लिये खत्म हो जाए। फूल की पंखडी से कट सकता है लोहे का जिगर इसलिये आपने तशशदुद का मुकाबला अदम तशशदुद से किया। आज दुनिया अदम तशशदुद की दुहाई देती है,मगर इसकी इब्तिदा करबला में हुई। जुल्म बरबरीयत, दरिन्दगीं और शैतानी ताकत को ऐसी शाकिसत मिली आज यजीद का नामों निशान बाकी नही है। 

दो मोहर्रम से रोजें आशूरा तक हुसैन का करबला में कयाम सदियों तक की अमली जिन्दगी पर भारी है। यह अजीब सितम जरिफी है कि दुनिया का आखरी पैगाम जो इन्सानें कामिल की पैरवी करता है, जो फितरी तकातों की कर्द करता है। दकिया नुसी रस्मों को सिरे से खारिज करता है। मसाबात का हामी है,इन्सानी अजमत का अलमबरदार है। हूजूर की वफात के बाद ऐसे दौर से गुजरा के खुदा की पनाह मेरे मौला तेरा एहसान है ना सिर्फ मुसलमानों पर पुरी इन्सानियत पर की आज दौर में इन कदरों की मकबुयित बढती जा रही है। यह कदरें एक मोहज्जिब कौम की निशानी बन गई है। यह कदरें तरक्की पसन्द समाज की जमानत बन गई है। इन कदरों में इन्सान की तरक्की और बेहबूदी का राज छुपा है और यही कदरें दुनिया के मुखतलिफ आईन की रूह बनकर रह गई है। हुसैन जिन्दाबाद,हुसैनियत पाईन्दाबाद। 

दुनिया को ज़रा बैदार तो हो लेने दो, 
हर कौम पुकारेगी हमारे है हुसैन
मिजाजें आदमी की आदमियत ढुढँने वालों,
तरिकें जिन्दगानी में शराफत ढुँढने वालों।
जहाँ में अमन व आजादी की सूरत ढुँढने वालों।
जमानें में मसावात और उखूव्वत ढुँढने वालो। 
भटकते हो किघर राहें हिदायत ढुँढने वालों,

सुए शब्बीर आओं दिने फितरत ढुँढने वालो।
निजाए बाहिनी मिट जाएगी इसे राह पर आओं,
उखूव्वत जिन्दगी कहलाएगी इस राह पर आओं। 
तुम्हारी रूह तसकी पायेगी इस राह पर आओं।
तुम्हें जिने में लज्जत आयेगी इस राह पर 
भटकते हो किधर राहें हिदायत ढुँढने वालों,
सुए शब्बीर आओं दिने फितरत ढुँढने वालो। 

आगे जारी......25 सितम्बर के अंक में 


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