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NEWS: क्रान्ति दरिन्दगी नहीं अत्याचार के खिलाफ युद्ध है - प्रो.रामप्रकाश त्रिपाठी

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NEWS: क्रान्ति दरिन्दगी नहीं अत्याचार के खिलाफ युद्ध है - प्रो.रामप्रकाश त्रिपाठी

नीमच :-

क्रान्ति से प्रकृति स्नेह करती है, क्रान्ति के बिना कोई प्रगति नहीं है, क्रान्ति दरिन्दगी नहीं अत्याचार के खिलाफ युद्ध है। उक्त उद्गार साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक संस्था कृति द्वारा आयोजित षहीदे आजम भगतसिंह, सुखदेव व राजगुरू की षहादत दिवस (23 मार्च) के पूर्व 18 मार्च को आयोजित एक कार्यक्रम में लोक जतन भोपाल के कार्यकारी सम्पादक, लेखक, कवि, चिन्तक, रामप्रकाष त्रिपाठी ने व्यक्त किए।

त्रिपाठी ने कहा कि आजादी में सैंकडों लोगों ने षहादत दी। उनकी देषभक्ति का जज्बा कोई कम नहीं था। उनके त्याग और बलिदान को भी कम करके नहीं आंका जा सकता। लेकिन उन सब षहीदों में षहीदे आजम का दर्जा भगतसिंह को मिला। भगतसिंह के दूध के दांत भी नहीं टूट थे। तब से उनमें क्रान्तिकारी विचारों का प्रस्फुटन हो गया था। एक बारह वर्ष का लडका जलियांवाला बाग से खून से सनी हुई मिट्टी अपने घर ले आया था, उसे वह प्रेरणा की तरह देखते थे कि यह मिट्टी उन बेकसूर लोगों की हैं, जिन्हें अंग्रेजों ने बर्बरतापूर्वक मार दिय। वह मिट्टी उन्हें याद दिलाती थी कि हमें इस दरिन्दगी से देष आजाद करवाना है। भगतसिंह क्रान्ति को एक पुख्ता और जिन्दा ताकत मानते थे। क्रान्ति अंधकार के बीच रोषनी का समर्थन है। भगतसिंह ने लिखा था भारत साम्राज्यवाद के जूते के नीचे पिस रहा है, मेहनतकष वर्ग की हालत बहुत खस्ता है, भारतीय पूंजीवाद विदेषी पूंजीवाद से गठजोड कर रहा है। लेनिन से भगतसिंह का वैचारिकत रिष्ता रहा। फांसी से पहले जब उन्हें गुरूग्रंथ साहब का पाठ सुनाने की कहा गया तो उन्हेांने कहा ठहरो अभी एक क्रान्तिकारी दूसरे क्रान्तिकारी से वार्ता कर रहा है, वह तब लेनिन को पढ रहे थे। भगतसिंह का महात्मा गांधी से वैचारिक मतभेद रहा, परन्तु उन्होंने कभी कांग्रेस अथवा महात्मा गांधी का विरोध नहीं किया क्योंकि वे आजादी के आन्दोलन को कमजोर करना नहीं चाहते थे। उनके लिये प्राथमिकताओं में देष सर्वोपरि था। भगतसिंह सम्प्रदायवाद, जातिवाद के सख्त खिलाफ थे। वे जनता में वैचारिक क्रान्ति चाहते थे। उनके पास भारत के भविष्य के लिये सोच थी जिसमें वे सभी को समान अवसर व अधिकार देना चाहते थे। 

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रगतिषील लेखक संघ की प्रदेष कार्यकारिणी के सदस्य हरनामसिंह चंदवानी ने कहा कि भगतसिंह क्रान्तिकारी तो थे ही वे कवि, पत्रकार और लेखक भी थे किसी की किसी की षहादत से तुलना नहीं की जा सकती। भगतसिंह इस देष में समाजवाद चाहते थे। भगतसिंह ने ही साम्राज्यवाद मुर्दाबाद, इंकलाब जिन्दाबाद का नारा प्रचलित किया। वे धर्मान्धता के विरूद्ध थे। उन्होंने एक पुस्तक लिखी थी मैं नास्तिक क्यों हूं। भगतसिंह एक ऐसा समाज चाहते थे जहां न देने वाला होगा न लेने वाला। सबका समान अधिकार होगा। वे छुआछुत के खिलाफ थे। उन्होंने फांसी से पहले बेबे (मां) के हाथ की रोटी खाने की इच्छा जाहिर की थी। जेल में जो सफाईकर्मी महिला थी उसे वह बेबे कहते थे, इससे जाहिर होता है कि वे उंच नीच के विरूद्ध थे। भगतसिंह के उपर अभी तक 150 से अधिक विभिन्न भाषाओं में पुस्तकंे लिखी जा चुकी हैं। वे इतनी कम उम्र में सैंकडों वर्षों का सोच दे गये। भगततसिंह जैसे महान क्रान्तिकारी कभी मरते नहीं हैं, वे हमारे दिलों में विचारों में सदैव जीवित रहते हैं। 

कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथियों द्वारा सरस्वती एवं भगतसिंह के चित्रों पर माल्यार्पण किया गया। स्वागत उद्बोधन कृति के अध्यक्ष किषोर जेवरिया ने दिया। कार्यक्रम का संचालन ओमप्रकाष चैधरी ने किया। आभार कृति के सचिव सत्येन्द्रसिंह राठौर ने व्यक्त किया। 

इस अवसर पर नगर के प्रबुद्धजनों में प्रो.आर.एन.जैन, एम.एम.जाधव, डाॅ.हरनारायण गुप्ता, अर्जुनलाल नरेला, निरंजन गुप्ता, विजय बैरागी, षैलेन्द्र पोरवाल, काम.षैलेन्द्रसिंह ठाकुर, प्रकाष भट्ट, बी.आर.उपाध्याय, रघुनंदन पाराषर, कमलेष जायसवाल, माधुरी चैरसिया, हेमलता धाकड, राजेष जायसवाल, गणेष खण्डेलवाल, दर्षनसिंह गांधी, भरत जाजू, नरेन्द्र पोरवाल, सत्येन्द्र सक्सेना, मुकेष कासलीवाल, महेन्द्र त्रिवेदी, प्रकाष मानव, महेष पाटीदार, जिनेन्द्र सुराना, विजयषंकर षर्मा, षिवषंकर षर्मा, कमल उपाध्याय, हरिष उपाध्याय, गुणवंत गोयल, राजेष मानव, मीना जायसवाल पार्षद, जीवन कौषिक, बाबूलाल गौड, बाबूलाल पोरवाल, प्रवीण षर्मा, प्रेमप्रकाष जोषी, षिवनारायण वर्मा, किषोर कर्णिक, कमल गोयल, रामलाल रामरख्यानी, जगमोहन कटारिया इत्यादि कई गणमान्य नागरिक बडी संख्या में उपस्थित थे। 


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