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NEWS: सच्‍चाई पर दर्शार्इ गई फिल्‍म मणिकर्णिका, फिल्‍म में एक किरदार देशभक्‍त गौस खां का भी, गौस खां थे निम्‍बाहेंडा निवासी, चौथी पीढी आज भी नयागांव में निवासरत, पढें मनीष चांदना की खास खबर

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NEWS: सच्‍चाई पर दर्शार्इ गई फिल्‍म मणिकर्णिका, फिल्‍म में एक किरदार देशभक्‍त गौस खां का भी, गौस खां थे निम्‍बाहेंडा निवासी, चौथी पीढी आज भी नयागांव में निवासरत, पढें मनीष चांदना की खास खबर

निम्‍बाहेंडा :-

निम्‍बाहेंडा, सच्‍चाई पर दर्शाई गई फिल्‍म मणिकर्णिका देश के सिनेमाघरों में पर्दे पर जारी है फिल्‍म मणिकर्णिका में एक किरदार देशभक्‍त गौस खांन का भी है और गौस खांन राजस्‍थान के निम्‍बाहेंडा निवासी थे, आपकों बता दें गौस खांन की चौथी पीढी आज भी नयागांव में निवासरत है 
जी हां यह शेर राजस्‍थान के निम्बाहेड़ा निवासी एक आजादी के दीवाने पर एक दम सटीक बैठता है जिसने स्वामी भक्ति की बेमिसाल नजीर पेश करने के साथ मातृभूमि की रक्षा एवं देशप्रेम की भावना के चलते ऐसी लड़ाई लडी कि दुश्मनों के दांत खट्टे हो गये, इसके लिये उन्होने जान की परवाह नहीं की और देश की स्वतंत्रता के लिये शहीद हुए सेनानियों में शामिल हो गये।

यहां आज हम जिनके बारे में चर्चा कर रहे है वे ऐसे आजादी के दीवाने, निम्बाहेड़ा की मिट्टी में रचे बसे पढ़े लिखे, बेड़ा बक्षी निवासी गुलाम गौस खां है जिनको गुलामी से सख्त नफरत थी, देश भक्ति का जज्बा उनमें कूट कूट कर भरा था। वर्तमान में टाकीजों में चल रही मणिकर्णिका झांसी की रानी फिल्म में गौस खान का किरदार बताया गया है जिसे फिल्म कलाकार डेनी ने बखूबी निभाया है। 

गौस खां का वास्तविक परिवार या यूं के उनकी चोथी पीड़ी राज.के निम्बाहेड़ा व नयागांव जिला-नीमच में निवासरत है उनके परिवारजनों की माने तो उन्होंने बताया कि टोंक रियासत के पहले नवाब अमीरूद्दौला (1817 से 1834) के शासन काल में अफगानिस्तान से एक बक्षी परिवार निम्बाहेड़ा में आकर बसा, इस परिवार के दो भाई मो. मोहीउद्दीन व गुलाम गौस खां शामिल थे, इन्ही के चोथे वंशज एडवोकेट फहीम खान बक्षी व आदिल काजी ने बताया की ये दोनो जांबाज सिपाही थे तथा युद्धकलां, तोप निर्माण एवं तोप चालन में सिहस्त थे। इस दौरान पूरे देश में अंग्रेजो के विरूद्ध आजादी की लड़ाई पूरे शबाब पर थी। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई एवं अंग्रेजो के बीच भी युद्ध की आखं मिचौली चल रही थी।

इसी दौरान उन्हे पता चला कि निम्बाहेड़ा में गुलाम गौस खां ऐसे ही जांबाज एंव सिद्धहस्त तोपची थे, इस पर उन्हें झांसी की सेना में मुख्य तोपची के पद पर नियुक्ति का निमत्रंण मिला । गुलाम गौस खां ने झांसी पहुंच कर एक लाजवाब व दूर तक मार करने वाली तोप कडक बिजली का निर्माण किया। 4 जून 1858 को अगे्रजों के साथ हुए युद्ध में तोप चलाने के दौरान ही वे अंग्रेज सेना के निशाने पर आ गए और शहीद हो गए। इस दृश्य का फिल्मांकन मणिकर्णिका झांसी की रानी फिल्म में बताया गया है। आज गुलाम गौस खां को भी आजादी के दीवानों के तौर पर शिद्दत याद किया जाता है है।

देशभक्त गौस खां की चौथी पीड़ी है निम्बाहेड़ा व नयागांव में निवासरत-

वर्तमान में गौस खान की चैथी पीढ़ी निम्बाहेड़ा और नीमच जिले के नयागांव में उनका परिवार निवास करता है। फरीदा बक्षी उनके पति मो. आरिफ काजी नयाग़ाव निवासी है वहीं फहीम एहमद खान बक्षी निम्बाहेड़ा में निवासरत है। 

झांसी की रानी -

१९ नवंबर १८३५ को वाराणसी जिले के भदैनी मुहल्ले में मोरोपंत तांबे, भागीरथीबाई के घर एक पुत्री जन्मी, जिसका नाम रखा गया मणिकर्णिका मनु,। बचपन से ही उसने पढ़ाई व खेल कूद में विलक्षण प्रतिभा दिखायी। सात साल की उम्र में ही वह घुड़सवारी और तलवार चलाने में, धनुर्विद्या में निपुण हुई। बचपन में उसने पिता से कुछ पौराणिक वीरगाथाएँ सुनीं थीं और वीरों के लक्षणों व उदात्त गुणों को उसने अपने हृदय में संजोया हुआ था। उस असाधारण कन्या को देखकर मुग्ध झाँसी के कुछ वंश रक्षक पुरोहितों ने उसका विवाह राजा गंगाधरराव से कराया। विवाह के बाद इनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। सन १८५१ में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया पर चार महीने की आयु में ही उसकी मृत्यु हो गयी। राजा गंगाधर राव का बहुत अधिक स्वास्थ्य बिगड़ने लगा था जिसे देख कर उन्हें दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी गयी। पुत्र के गोद लेने के दूसरे दिन ही २१ नवंबर १८५३ में राजा गंगाधर राव की दुखद मृत्यु हो गयी। इस दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया। खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी । झांसी की रानी ने घोड़े पर सवार, दाहिने हाथ में नंगी तलवार लिए, पीठ पर पुत्र को बाँधे हुए रानी ने रणचण्डी का रुप धारण कर लिया और शत्रु दल संहार करने लगीं। झाँसी के वीर सैनिक भी शत्रुओं पर टूट पड़े। आज भी बलिदान दिवस के आयोजनों में देश की आजादी की खातिर अपने प्राणों की आहूति देने वाले शहीदों का पुण्य स्मरण किया जाता है। साथ ही हर साल १८ जून को रानी लक्ष्मी बाई की पुण्यतिथि पर उनकी समाधि स्थल पर विशेष कार्यक्रम होते हैं।


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