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NEWS: ओली तप आराधना महोत्सव में उमेड़े श्रद्धालु, आचार्य निपुणरत्‍न महाराज बोले संत परिवेश को पुरे विश्‍व में अलग सम्मान मिलता है

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NEWS: ओली तप आराधना महोत्सव में उमेड़े श्रद्धालु, आचार्य निपुणरत्‍न महाराज बोले संत परिवेश को पुरे विश्‍व में अलग सम्मान मिलता है

नीमच :-

नीमच 15 अप्रेल 19 (केबीसी न्यूज)। पवित्र भक्ति भाव से व्यक्ति की श्रेष्‍ठता परिलक्षित होती है । व्यक्ति को संत का परिवेश पुरे विश्‍व में अलग पहचान एवं सम्मान दिलाता है ।

वर्तमान जमाना दिखावे में चल रहा है लेकिन साधु दिखावे से दूर रहते है । फिर भी वे प्रख्यात होते है । संत आंतरिक रूप से भी उज्जवल होते है यह बात यह बात आचार्य निपुणरत्न विजय श्रीजी म.सा. ने कही वे सोमवार सुबह मेवाड़ देषोद्धारक 400 तेले के तपस्वी आचार्य देवेष जितेन्द्र सूरीष्वर महाराज के सुषिश्य आचार्य निपुणरत्न सूरी महाराज ने कही । वे श्री भीड़ भंजन पाष्र्वनाथ जैन ष्वेताम्बर मंदिर ट्रस्ट नीमच एवं षांतिलाल गांधी परिवार जाटवाले के संयुक्त तत्वाधान में सोमवार 15 अप्रेल को सुबह 9 बजे पुस्तक बाजार आराधना भवन में चेत्रमास सामुहिक ओली आराधना महोत्सव के निमित्त आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे उन्होने कहा कि वर्तमान युग में मानव का मानव पर भरोसा कम हो रहा है देष में व्याभिचार भ्रश्टाचार फैल रहा है लोग अनुचित गठबंधन कर देष भर षासन कर रहे है सत्ता के लालच में नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है चिंतन का विशय है ।

राजरत्न विजय महाराज ने कहा कि वर्तमान में ध्यान का प्रचार बहुत बढ़ रहा है । योग के प्रति जनसमुह आर्कशित भी हो रहा है नवकार महामंत्र का सद्उपयोग मानव नहीं कर पा रहा है । सिद्धचक्र की आराधना करने से मन षांत होता है । जब भाग्य में असफलता मिलती है तो किसी भाग्यषाली का साथ लेना चाहिए तो सफलता का मार्ग खुल सकता है । प्रभु का बताया मार्ग उत्तम होता है । प्राचीनकाल में राजा की षरण में आने वाले पर प्रहार नहीं होता था । प्राचीनकाल में बेटी का विवाह के बाद विदाई के समय ससुराल में पहुॅच कर सभी परिवारजनों का मन जीतने की षिक्षा दी जाती थी । वर्तमान में विष्वास भरोसा कम हो रहा है ।

जिस व्यक्ति को पुण्य पुरूशार्थ परमात्मा पर विष्वास होता है वह कभी असफल नहीं होता है । मानव संसार के कीचड़ की मोह माया में इतना उलझा है कि वह धर्म स्थान पर भी संसार की समस्याओं में खोया रहता है । प्राचीनकाल कानुन सख्त थे तब अनुषासन भी था आज कानुन भी लचीला है और अनुषासन भी कम है । धर्मसभा में राजरत्न महाराज ने श्रीपाल कुंवर, सिद्धचक्र प्रभाव, समुन्द्रीयात्रा, सतयुग, कलियुग, संस्कार सजजनता, घवल सेठ, मदन रेखा, मदन मंजूशा, प्रभु अंगरचना आदि धार्मिक प्रसंगों का वर्तमान परिपेक्ष्य में महत्व प्रतिपादित किया ।

मुनि निर्मोह सुन्दर महाराज ने कहा कि चर्तुविद संघ में साथ-साध्वी बिना षासन अधुरा है । केवल ज्ञान अनंत है तिलक लगाते समय परमात्मा को सर्वोपरि मानते है परमात्मा की आज्ञा पालन में आनंद मिलता है संत के लिए रात्रि भोज पंच महावृत, छः कायकी रक्षा, व्यक्ति की रक्षा का संकल्प लेना होता है मनुश्य संसार रूपी कीचड़ में फंसा है संत यहा से निकालकर मोक्ष दिलाते है ।  दोर्णाचार्य अर्जुन से युद्ध में कमजोरी से हार रहे थे तब दुर्योधन ने कहा कि दोणाचार्य जी आपने तो ही अर्जुन को सिखाया है फिर भी वह आपसे जीत क्यों रहा है । तब दोर्णाचार्य ने कहा कि में दुर्योधन आपके महल में 56 भोग का सेवन कर कमजोर हो गया हूॅ लेकिन अर्जुन वनवास में रहकर मजबूत हो गया था इसलिए वह षक्तिषाली हो गया था । आचार्य श्री ने कोई साधु बने तो अनुमोदना करे किसी को नहीं टोकने का संकल्प भी दिलाया । कायर वो है, जिसे समाज बदलता है । बहादुर वो है जो समाज को बदलता है । भजन गायक कलाकार विनित जैन ने पंचम काल में जो इंसान साधु बने वो महान......भजन प्रस्तुत किया । चाहे कितना भी कश्ट पड़े साधु जीवन में प्रभु की कृपा ये है कि वो मन के भावो को चंचल नहीं बनने देते । गिरते नहीं देते । श्रीकृश्ण से अर्जुन ने कहा कि मुझे स्वयं पर लक्ष्य तीर से जीतना हे । तो कृश्ण ने अर्जुन से कहा कि वह मछली की आंख में लक्ष्य साधे नीचे बर्तन में जो पानी होगा उसकी लहर की हवा को मे स्थिर कर दुंगा तब तुम लक्ष्य को भेद दोगे हर कठिन कार्य में प्रभु का साथ होना आवष्यक होता है लेकिन परिश्रम भक्त को स्वयं करना होता है ।
 


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