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BIG REPORT : वरिष्ठ सम्पादक राजेश मानव की कलम से निकली बड़ी बात, पढ़िए क्या है आचार संहिता के मायने    

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BIG REPORT : वरिष्ठ सम्पादक राजेश मानव की कलम से निकली बड़ी बात, पढ़िए क्या है आचार संहिता के मायने    

नीमच :-

पूरे देश में लोकसभा चुनाव की धूम है, आचार संहिता लगी हुई है मतलब धारा 144 भी लगी है । जनप्रतिनिधियों के नाम व फोटो शासकीय विज्ञापन व होल्डिंग से हटा दिये गये है या पोत दिये गये है । एक विचार आया, यह आचार संहिता बारहों माह ही क्यों ना लगी रहे ? केवल चुनाव तक ही क्यों ? जब शासकीय सेवक, देश का सिपाही सभी अनुशासन में रहते हैं तो जनप्रतिनिधि क्यों नहीं उस दायरे में आते है ? वे भी तो तनख़्वाह लेते है उनको भी पेंशन मिलती है ।

फिर सरकारी कर्मचारी और उनमें क्या अंतर है ? जनता द्वारा टेक्स के रूप में जमा पैसे को वे ऐसे उड़ाते है जैसे उनके बाप-दादाओं का हो ! हद तो तब हो गई जब वोट प्राप्त करने के लिये खुले आम बढ़-चढ़कर खैरात बांटने की प्रतिस्पर्धा हो रही है ।            

होना तो यह चाहिये कि जैसे सरकारी सेवकों को उनके कार्य की एवज में पारिश्रमिक मिलता है और उन पर किसी प्रकार के प्रचार-प्रसार से दूर रहने की हिदायत होती है, ठीक वैसी ही जनता की सेवा करने वाले जनसेवकों ( जनप्रतिनिधियों) की होनी चाहिये ! जब सरकारी पैसे से किसी भी योजना के तहत सामग्री गरीब, आदिवासी या किसानों आदि को बांटी जाए या  आमजन के लिये जैसे- टैंकर या प्रतिक्षालय इत्यादि दिये जाए तो उस पर विधायक या सांसद का फोटो क्यों होना चाहिये ?

नगर के गेट पर अध्यक्ष/उपाध्यक्ष के फोटो क्यों होना चाहिये ? हमारे देश में लोकतंत्र है, कोई राजतंत्र नहीं है जो हम किसी विशेष व्यक्ति को महिमा मंडित करते फिरे । इस पर गहन चिंतन-मनन और दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता है । विचार निकला है तो दूर तलक केवल जनता ही ले जा सकती है । -राजेश मानव  मो 9425106311


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