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NEWS: कांठल की जलवायु मसाला फसलों के लिए मुफीद, पढें खबर

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NEWS: कांठल की जलवायु मसाला फसलों के लिए मुफीद, पढें खबर

प्रतापगढ़़ :-

प्रतापगढ़, यहां कृषि विज्ञान केन्द्र में बीजीय मसालों की जैविक खेती पर सोमवार को एक दिवसीय प्रशिक्षण हुआ। अध्यक्षता राष्ट्रीय बीजीय मसाला अनुसंधान केन्द्र, तबीजी अजमेर के निदेशक डॉ. गोपाललाल ने की। डॉ. गोपाल लाल ने बताया कि प्रतापगढ़ की जलवायु और मिट्टी दोनों ही मसाले वाली फसलों के लिए अनुकूल है। क्षेत्र में मसाला की फसलों में रोग व कीट अन्य फसलों की तुलना में कम लगते है।

साथ में अन्य फसलों की तुलना में कम उर्वरक व पानी की आवश्यकता होती है। प्रतापगढ़ की मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा भी अधिक है, जिससे मसाला व अन्य फसलों की खेती आसानी से की जा सकती है। उन्होंने किसानों को ज्यादा से ज्यादा जैविक खेती अपनानेे की सलाह दी। बताया कि अन्नदाता को जहरीले रसायनों का कम से कम प्रयोग करना चाहिए। जिससे वे स्वयं और साथ में उपभोक्ता भी स्वस्थ रह सकें। उन्होंने वर्षा का पानी भी संग्रहण करने की भी सलाह दी। 
केन्द्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रभारी डॉ. योगेश कन्नोजिया ने बीजोपचार व पोषक तत्व के बारे में विस्तार से जानकारी दी। डॉ. कनोजिया ने किसानों मिट्टी की जांच, नमूना कैसे लें, क्षारीय मृृदाओं को कैसे सुधारें, के बारे में जानकारी दी। उन्होनें कहा कि कहा कि बुवाई से पहले बीज को सुरक्षा का टीका लगाने के लिए बीजोपचार करें। राष्ट्रीय बीजीय मसाला अनुसंधान केन्द्र, अजमेर वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. नरोश्रम कुमार मीणा ने बताया कि मैथी, धनिया, सौंफ, कलौंजी, सोवा व अजवाईन की फसलों से अन्य फसलों की तुलना में किसान अधिक लाभ उठा सकते है। उन्होनें उकठा रोग, झुलसा रोग, छाछ्या रोग व कीट दीमक व माहु के नियंत्रण के प्रभावी तरीके क बारे में बताया। अजमेर के वैज्ञानिक डॉ. शिवलाल मीणा ने बताया की किसान उचित फसल चक्र अपनायें। उन्होनें बताया कि बीज को बुवाई से पूर्व फफूंदनाशक, कीटनाशक व कल्चर से उपचारित करना चाहिए। 

राजस्थान और गुजरात में ८० प्रतिशत मसाला फसलों की खेती-

इस मौके पर वैज्ञानिक डॉ. एम.डी. मीणा ने बताया की किसान उचित फसल चक्र अपनाएं। उन्होनें बताया कि भारत में राजस्थान व गुजरात दोनों राज्य मिलकर बीजीय मसालों का 80 प्रतिशत उत्पादन करते है। साथ ही बीजीय मसालों का 90 प्रतिशत हिस्सा हमारे स्वयं के द्वारा उपयोग किया जाता है। बचा हुआ 10 प्रतिशत हिस्सा ही संसार की 55 प्रतिशत मांग की आपूर्ति करता है। बीजीय मसालों के मामले में अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में भारत में अहम भूमिका निभाता है।

डॉ. एन. चौधरी ने मसालों की जैविक खेती के बारे में जानकारी दी। केन्द्र के तकनीकी सहायक डॉ. रमेश कुमार डामोर ने बताया की वर्तमान परिस्थितियों में प्रतापगढ़ जिले की जलवायु मसाला फसलों के लिए अनुकुल है। उन्होनें उन्नत किस्म के बीज का प्रयोग कर अधिक पैदावार के बारे में जानकारी दी।


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