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AUTOMOBILE: ...ताकि आपका कार इंश्योरेंस न हो जाए बेकार

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AUTOMOBILE: ...ताकि आपका कार इंश्योरेंस न हो जाए बेकार

डेस्‍क :-

क्या आपने कार खरीदी है? क्या आपने कार का बीमा कराया है? क्या आपने कार का सही बीमा कराया है? चौंक गए ना आप! चौंकिए मत, गाड़ियों का बीमा तो सभी कराते हैं, लेकिन सही बीमा बहुत कम लोग कराते हैं। इस बारे में जानकारी दे रहे हैं राजेश भारती। इस बारे में राजेश भारती ने पॉलिसीबाजारडॉटकॉम के चीफ बिजनेस ऑफिसर (जनरल इंश्योरेंस) तरुण माथुर और बजाज अलियांज जनरल इंश्योरेंस के प्रेजिडेंट और कंट्री हेड (मोटर बिजनेस) गुरनीश खुराना से बातचीत की है
नई कार खरीदने के बाद कई तरह के रिस्क बढ़ जाते हैं। कार चोरी हो जाए, डैमेज हो जाए, स्क्रैच आ जाए, एक्सिडेंट हो जाए और उससे किसी की मौत हो जाए, इन परिस्थितियों में बीमा कंपनी का सहारा आपको मिलता है। ऐसे में आप आर्थिक बोझ से बच जाते हैं। साथ ही, किसी दुर्घटना के कारण बीमा होल्डर को चोट, शारीरिक अपंगता या मौत का मुआवजा भी बीमा कंपनी देती है। 
गाड़ियों का बीमा मुख्यत: दो तरह का होता है: 
1. थर्ड पार्टी इंश्योरेंस 
कार या सभी प्रकार के वाहनों का थर्ड पार्टी इंश्योरेंस होना अनिवार्य है। इस बीमा में वह तीसरा व्यक्ति कवर्ड होता है जो कार से हुई दुर्घटना में घायल होता है या उसकी मौत हो जाती है। ऐसे मामलों में मुआवजे का खर्चा बीमा कंपनी उठाती है। नई कार खरीदने पर यह इंश्योरेंस एक साथ तीन साल का लेना अनिवार्य कर दिया गया है। 
2. कॉम्प्रिहेन्सिव पॉलिसी 
इस पॉलिसी में आपको और आपकी कार को हुए नुकसान को भी कवर किया जाता है। यह इंश्योरेंस किसी भी बाहरी हादसे जैसे दंगा, भूकंप, एक्सिडेंट आदि के कारण हुए नुकसान के अलावा वाहन चोरी होने पर भी मुआवजा पाने का हक देता है। इसमें थर्ड पार्टी इंश्यारेंस के लाभ के साथ-साथ कार मालिक या ड्राइवर को भी सुरक्षा मिलती है। इसमें थर्ड पार्टी इंश्योरेंस भी शामिल होता है। 
ये कवर भी ले सकते हैं आप 
पर्सनल एक्सिडेंट पॉलिसी: मालिक या ड्राइवर के पास पर्सनल एक्सीडेंट कवर होना जरूरी है। इस पॉलिसी में डेथ, आंशिक या पूरी तरह शारीरिक रूप से अक्षम होने पर कवर मिलता है। 
ऐड-ऑन कवर: कार के लिए सिर्फ बीमा ही काफी नहीं है बल्कि बीमा के साथ ऐड-ऑन कवर भी लेना चाहिए। हालांकि ऐड-ऑन कवर के लिए एक्स्ट्रा प्रीमियम देना पड़ता है। 
ऐड-ऑन कवर इस प्रकार हैं... 
जीरो डेप्रिसिएशन: जैसे-जैसे वाहन पुराना होता जाता है उसकी कीमत साल-दर-साल 5 से 15 फीसदी कम होती जाती है। कीमत में आई गिरावट को ही डेप्रिसिएशन कहते हैं। कार के बीमा के साथ जीरो डेप्रिसिएशन कवर लेना बेहतर होता है। यह वाहन को किसी प्रकार का नुकसान होने पर पूरा क्लेम दिलाने में मदद करता है। 
रोड साइड कवर: कार के रास्ते में खराब होने पर यह पॉलिसी मदद करती है। यह ऐड-ऑन कवर के लेने पर आपको बिना कोई पैसा खर्च किए देशभर में ऑन द स्पॉट गाड़ी ठीक कराने की सुविधा दी जाती है। गाड़ी के ठीक होने तक अगर आप किसी होटल में रुकते हैं तो कुछ शर्तों के साथ इसका खर्चा भी बीमा कंपनी देती है। 
इंजन और सर्किट कवर: कई बार कार में चलते-चलते इंजन या इलेक्ट्रॉनिक सर्किट के कारण अचानक आग लग जाती है या कोई नुकसान हो जाता है तो ऐसे में यह बीमा गाड़ी मालिक के नुकसान को कवर करता है। इस कवर का फायदा गर्मियों में अधिक होता है, क्योंकि गर्मियों में कार में आग लगने के मामले बढ़ जाते हैं। 
रिटर्न टु इनवॉइस: कार के चोरी होने पर ऐड-ऑन कवर के सहारे आपको कार की पूरी रकम मिल जाती है। साथ ही, इसमें आपको वह पैसा भी मिल जाता है जो आपने कार के रजिस्ट्रेशन और टैक्स में चुकाया था। 
इंजन प्रोटेक्टर: किसी भी प्राकृतिक कारणों जैसे बाढ़, भूकंप आदि से इंजन के खराब होने पर इस कवर के जरिए उसकी पूरी रकम मिल जाती है। अगर आप चाहें तो बिना कोई पैसा दिए इंजन भी बदला सकते हैं। 
ऐसे काम आता है ऐड-ऑन कवर 
पहला उदाहरण: मान लें, रोहित ने साल 2018 में 10 लाख रुपये में कार खरीदी। कार का एक्सिडेंट हो गया। रोहित के पास कॉम्प्रिहेन्सिव बीमा है। रोहित कार को ठीक कराने जाता है तो 50 हजार रुपये का खर्चा आता है। नुकसान की भरपाई के लिए रोहित ने बीमा कंपनी में क्लेम भेजा। कंपनी ने क्लेम के 30 हजार रुपये ही दिए और बाकी 20 हजार रुपये रोहित को अपनी जेब से देने पड़े। लेकिन अगर रोहित ने जीरो डेप्रिसिएशन कवर लिया होता तो नुकसान की भरपाई के बाकी के 20 हजार रुपये भी इंश्योरेंस कंपनी को ही देने पड़ते। 
दूसरा उदाहरण: रोहित ने साल 2019 में 12 लाख रुपये की कार खरीदी। कार की एक्स शोरूम कीमत 8 लाख रुपये थी। बाकी के 4 चार लाख रुपये रोहित को रजिस्ट्रेशन, टैक्स आदि के देने पड़े। दो महीने बाद वह चोरी हो गई। कॉम्प्रिहेन्सिव पॉलिसी होने पर कंपनी रोहित को कार के एक्स-शोरूम कीमत का 5% कम करके बाकी रकम 7.60 लाख रुपये दे देगी। यह रकम कार की मौजूदा मार्केट वैल्यू (IDV) के हिसाब से तय होती है। अगर रोहित ने रिटर्न टु इनवॉइस का ऐड-ऑन कवर लिया होता तो बीमा कंपनी रोहित को पूरे 12 लाख रुपये देती। 
प्रीमियम में नहीं आता ज्यादा फर्क 
ऐड-ऑन कवर लेने पर जेब थोड़ी ढीली करनी पड़ती है। हालांकि, यह ज्यादा नहीं होता। ऐसे जानें, कितना पड़ेगा अंतर: 
- मान लीजिए आज की तारीख में किसी कार का कॉम्प्रिहेन्सिव इंश्योरेंस प्रीमियम 14050 रुपये है। 
- जीरो डेप्रिसिएशन कवर लेने पर 2650 रुपये और देने होंगे। प्रीमियम की कुल रकम होगी 16700 रुपये। 
- रिटर्न टु इनवॉइस के 2 हजार रुपये अतिरिक्त देने होंगे। यानी आपके कुल प्रीमियम की रकम होगी 18700 रुपये। 
- यह अगर आपको ज्यादा लग रहा हो तो आप यह याद कर लें कि मुसीबत बुलाने पर नहीं आती, कभी भी आ जाती है और वैसी स्थिति में इंश्योरेंस ही आपकी मदद करता है। 
(नोट: प्रीमियम बीमा कंपनी के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।) 
इन बातों पर दें ध्यान 
सभी शर्तों को ध्यान से पढ़ें: जरूरी नहीं है कि आप जिस डीलर से गाड़ी ले रहे हैं, उसी से गाड़ी की पॉलिसी कराएं। वाहन खरीदने से पहले डीलर से पॉलिसी के बारे में पूरी बात करें। पॉलिसी में बताए सभी नियमों और शर्तों को ध्यान से पढ़ें। पॉलिसी रकम, उसके फायदे और दूसरी जरूरी बातों को नोट भी कर लें। पॉलिसी को ऑनलाइन चेक करें। देखें कि डीलर जो पॉलिसी दे रहा है, क्या वह दूसरी पॉलिसियों से बेहतर है? अगर नहीं है तो डीलर से पॉलिसी ना लें। 
पॉलिसी पर नंबर चेक करें: कुछ उदाहरण ऐसे आए हैं जिसमें सामने आया है कि बीमा कंपनी ने कार पॉलिसी की जगह कवर नोट दे दिया। जब क्लेम किया गया तो वह रिजेक्ट हो गया। जांच में इस फर्जीवाड़े का पता चला। इससे बचने के लिए पॉलिसी लेते समय उस पर पॉलिसी नंबर देखें और बेहतर होगा कि उसका पेमेंट कैश की जगह चेक या ऑनलाइन करें। चेक किसी व्यक्ति के नाम का न हो। जिस कंपनी का बीमा है, उसी के नाम से देना चाहिए। 
ऑनलाइन भी हैं ऑप्शन 
अगर आप चाहें तो पॉलिसी ऑनलाइन भी ले सकते हैं। जब आप ऑनलाइन बीमा खरीदते हैं तो बीच में कोई एजेंट नहीं होता। ऐसे में इंश्योरेंस कंपनी आपको अच्छा डिस्काउंट दे देती है। 
इस बात का रखें ध्यान: गाड़ी का बीमा हमेशा IRDAI से मान्यता प्राप्त बीमा कंपनी से ही करवाएं। मान्यता प्राप्त बीमा कंपनी के बारे में IRDAI की ऑफिशल वेबसाइट irdai.gov.in से पता कर सकते हैं। 
...तो खारिज हो सकता है क्लेम 
पहले न करवाएं मरम्मत: एक्सिडेंट के बाद अमूमन लोग जल्दी से गाड़ी की मरम्मत करवा लेते हैं ताकि गाड़ी चलती रहे। वे बाद में इंश्योरेंस क्लेम करते हैं। कैशलेस सुविधा नहीं है तो इससे बचें। क्लेम पाने के लिए जरूरी है कि एक्सिडेंट के बाद बीमा कंपनी को इसकी सूचना दें। कंपनी की ओर से अधिकृत व्यक्ति सर्वे कर नुकसान का आकलन करता है और अपनी रिपोर्ट देता है, उसी के बाद इंश्योरेंस क्लेम पर विचार किया जाता है। 
नियम न तोड़े ड्राइवर: क्लेम देते समय इसकी भी पड़ताल होती है कि एक्सिडेंट के वक्त गाड़ी कौन चला रहा था। अगर ड्राइवर के पास वैध ड्राइविंग लाइसेंस नहीं है या उसने शराब पी रखी है या किसी और प्रकार का नशा कर रखा है तो ऐसे मामले में क्लेम खारिज हो सकता है। 
बिना बताए गाड़ी में बदलाव: गाड़ी खरीदने के बाद अगर आप उसमें किसी तरह का बदलाव कराते हैं तो इसकी जानकारी बीमा कंपनी को जरूर देनी चाहिए। कार में CNG/PNG किट, इंटीरियर में बदलाव और पेंट का काम भी बदलाव के दायरे में आता है। अगर आप इन बदलावों के बारे में बीमा कंपनी को जानकारी नहीं देते हैं तो क्लेम खारिज हो सकता है। 
पर्सनल की जगह कमर्शल यूज: बीमा करवाते समय आपको बताना होता है कि आप गाड़ी का प्रयोग पर्सनल यूज के लिए करेंगे या कमर्शल। अगर आप बीमा कंपनी को गाड़ी का प्रयोग पर्सनल बताते हैं और बाद में जांच-पड़ताल के दौरान पाया जाता है कि आप उसका कर्मशल यूज कर रहे थे तो ऐसे में क्लेम खारिज हो सकता है।
RC का पालन न करना: आपकी कार की आरसी में उसकी पूरी जानकारी दी होती है। अगर आप ऐसा कोई भी काम करते हैं, जो आरसी में नहीं है तो ऐसे में क्लेम नहीं मिलता है। इसे ऐसे समझें- कार की आरसी में लिखा होता है कि उसमें कितने लोग बैठ सकते हैं। अगर क्षमता से ज्यादा लोग कार में बैठे हैं और कार का एक्सिडेंट हो जाता है तो कंपनी क्लेम नहीं देगी। 

 


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