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NEWS: पुरानी तस्‍वीर के साथ जाने गांधी सागर बांध की पूरी कहानी, जिससे मध्यप्रदेश में आई है 'तबाही', जानें कब और क्यों बना, पढें खबर

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NEWS: पुरानी तस्‍वीर के साथ जाने गांधी सागर बांध की पूरी कहानी, जिससे मध्यप्रदेश में आई है 'तबाही', जानें कब और क्यों बना, पढें खबर

नीमच :-

मंदसौर/ गांधी सागर डैम लबालब भरा हुआ है। डैम के सभी गेट खोल दिए गए हैं। उसके बाद से मध्यप्रदेश के दो जिलों में तबाही आ गई है। बर्बादी का मंजर ऐसा कि हजारों लोग बेघर हो गए हैं। मंदसौर और नीमच जिले में इसका सबसे ज्यादा असर है। पच्चीस हजार से ज्यादा लोगों को रेस्क्यू कर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। आइए हम आपको बताते हैं कि गांधी सागर डैम की पूरी कहानी जिसकी वजह से इन दो जिलों स्थिति बेहद ही खराब है।

चंबल नदी पर बना गांधी सागर डैम भारत के चार प्रमुख डैमों में से एक है। यह बांध मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में स्थित है। इसका जलग्रहण क्षेत्र 22.184 किमी है जबकि सकल भंडारण की क्षमता 7.322 बिलियन क्यूबिक मीटर है। बांध की ऊंचाई 62.17 मीटर है। इस बांध की आधारशिला भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 7 मार्च 1954 को रखी थी। इसका निर्माण कार्य 1960 में पूरा किया गया था। 1970 के दशक में इसे पूरी तरह से तैयार कर लिया गया था। गांधी सागर बांध और पावर स्टेशन के निर्माण पर कुल खर्च लगभग रु 18 करोड़ 40 लाख हुआ धा।

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हाइड्रो पावर यूनिट भी है
वहीं, इस डैम से बिजली का उत्पादन भी होता है। 115-मेगावाट बिजली के उत्पादन के लिए 23-23 मेगावाट क्षमत की पांच टरबाइन लगी है। इस बार डैम फुल होने के बाद हाइड्रो पावर यूनिट में भी पानी घुस गया है। जिसकी वजह से बिजली उत्पादन ठप है। यहां से उत्पादित बिजली जिले की जरूरतों को पूरा करती ही है, साथ में राजस्थान के भी कुछ हिस्सों में यहां से बिजली सप्लाई होती है।

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कोटा बैराज में जाता है पानी
वहीं, बिजली उत्पादन के बाद जो पानी छोड़ा जाता है, वह कोटा बैराज में जाता है। जिसका प्रयोग सिंचाई के लिए होता है। इस बांध का जलाशय क्षेत्र हीराकुंड जलाशय के बाद भारत में दूसरा सबसे बड़ा है। इसके साथ ही गैर प्रवासी पक्षियों का यहां जमावड़ा भी यहां लगता है।

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चंबल के स्त्रोत से 344 किलोमीटर और 440 किलोमीटर के बीच गहरे घाटियों का एक क्षेत्र है, गांधी सागर बांध इस क्षेत्र के मध्य में बना हुआ है। यह मंदसौर जिला मुख्यालय से 168 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

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ऐसे हुई शुरुआत
चंबल रिवर वैली डेवलपमेंट को आजादी के बाद 1951 में भारत सरकार द्वारा शुरू की गई पहली पंचवर्षीय योजना के ऐतिहासिक कार्यों में से एक को चिह्नित किया। उस वक्त तक चंबल नदी विकसित नहीं हुई थी। फिर मध्यप्रदेश और राजस्थान की राज्य सरकारों की संयुक्त पहल के तहत इसे विकसित करने का प्लान था। 1953 में तैयार किए तीन-चरणों के प्रस्ताव में जल-विद्युत उत्पादन प्रदान करने के लिए तीन बांधों का आह्नान किया गया था। उसके बाद गांधी सागर बांध और कोटा बैराज की नींव पड़ी।

गांधी सागर बांध से बिजली का उत्पादन होता है, जबकि कोटा बैराज से प्राप्त पानी को मध्यप्रदेश और राजस्थान के बीच समान रूप से साझा किया जाता है। इसके साथ ही विकास के दूसरे चरण में राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में रावतभाटा में गांधी सागर से 48 किलोमीटर नीचे स्थित राणा प्रताप सागर बांध के माध्यम से गांधी सागर बांध से छोड़े गए पानी का उपयोग शामिल था। इस बांध में अतिरिक्त भंडारण कोटा बैराज से सिंचाई के लाभ में वृद्धि प्रदान करता है, जिससे सिंचाई का क्षेत्र 445,000 हेक्टेयरसे बढ़कर 567,000 हेक्टेयर हो जाता है।


इसके अलावा, बांध के पैर के एक बिजलीघर में 43 मेगावाट क्षमता के चार टर्बो जनरेटर से 172 मेगावाट की अतिरिक्त पनबिजली उत्पादन क्षमता प्रदान की जाती है। दूसरा चरण 1970 में पूरा हुआ। राणा प्रताप सागर बांध में उत्पन्न शक्ति को मध्य प्रदेश के साथ समान रूप से साझा किया जाता है, क्योंकि गांधी सागर बांध इस बांध में उपयोग के लिए संग्रहित पानी प्रदान करता है।

मंदसौर में आई है तबाही
अब जब गांधी सागर बांध ओवरफ्लो है तो मध्यप्रदेश के दो जिलों में भारी तबाही आ गई है। मंदसौर और नीमच के सैकड़ों गांव डूब गए है। शायद वर्षों बाद गांधी सागर डैम में यह स्थिति बनी है। रेस्क्यू के लिए वहां एनडीआरएफ और जिला प्रशासन की टीम तैनात मुस्तैदी के साथ डटी है। लेकिन स्थिति समान्य होने में अभी वक्त लगेगा। गांधी सागर बांध का विकराल रूप देख लोग सिहर जा रहे हैं।


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