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BIG NEWS: नगर मे हर्षो उल्ला स के साथ मनाया दिपावली पर्व,जगह जगह हुई गोवर्धन पुजा,पढे गोवर्धन पूजन पर बद्रीलाल गर्जर की ये विशेष खबर

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नीमच :-

देवरी खवासा  इस गोवर्धन को नये धान-मकई से सजाया जाता है हाथ-पांवों में अनाज के दानों के आभूषण बनाए जाते हैं। नई रुई और नये कपास का पहनावा दिया जाता है गले की हांसली और कमर का कंदोरा बनाया जाता है। उनके नाभिस्थल पर गन्ने का रोपण किया जाता है

भारत गांवों का कृषि प्रधान देश है पूरी कृषि बैल पर निर्भर है गाय संस्कृति हमारे देश की आत्म संस्कृति है, इसीलिए घर-घर गोपालन की प्रथा चली राजा-महाराजा अपने यहां बड़ी तादाद में गायें रखकर अपने राज्य को सुख-समृद्धिपूर्ण बनाए रखते थे नाथद्वारा के श्रीनाथजी मंदिर में गाय संस्कृति के कई निराले ठाठोत्सव देखने को मिलते हैं श्रीकृष्ण ने गायों को सर्वाधिक महत्तव और ममत्व दिया, फलस्वरूप पूरे भारत में अनेक रूपों में गाय संस्कृति का सांस्कृतिक अनुष्ठान और धार्मिक महात्म्य फलित हुआ गाय श्रेष्ठ दान की प्रतीक बनी और शादीब्याह जैसे मांगलिक प्रसंगों पर बहिन-बेटी को गाय देने की प्रथा चल पड़ी। भारतवंशियों ने गाय को माता माना और उतना ही आदर दिया।

नव प्रसूता गाय का दूध भी उतना ही बलिष्टकारी होता है इस दूध में चना तथा मोगर की दाल खूब अच्छी तरह भिगो दी जाती है और फिर इसे एकाकार कर इसके लड्डू बनाये जाते हैं। ये लड्डू बड़े ताकतवर होते हैं जो कमजोर महिलाओं को खिलाये जाते हैं। इसी दूध को हल्की आंच दे गर्म पानी पर जमाकर बली नामक मिष्ठान बनाया जाता है,जो बड़ा ही स्वादिष्ट तथा गुणकारी होता है मेवाड़ में इसकी बड़ी बड़ाई है गायों का सर्वाधिक महत्व हमारे देश में ही है श्रीकृष्ण के कारण इसका सुव्यवस्थित समुचित विकास हुआ और गोवर्धन पर्वत का किस्सा तो सभी का ज्ञात है

ब्रज में एक ग्वाला था जिसका नाम गोरधन था। इसकी घरवाली श्रीकृष्ण की परम भक्त थी श्रीकृष्ण ने उसे दर्शन दिये। वहीं गोरधन भी था उसने चाह प्रकट की कि गाय के पांव से कुचलने पर ही उसका प्राण निकले। यही हुआ तब श्रीकृष्ण ने उसी गाय के गोबर से उसका पुतला बनाया और घर-घर पूजा प्रारंभ की तब से दीवाली के दूसरे दिन गोरधन-पूजा प्रारंभ हुई उसी दिन से गोबर का सर्वाधिक महत्तव प्रतिपादित हुआ तब से गोबर कहीं व्यर्थ नहीं जाने दिया जाता है। खेती के लिए सर्वोपयोगी गोबर की ही खाद कही गयी है यह गोबर सारे धार्मिक अनुष्ठानों और मंगलकारी सुकृत्यों का श्रेष्ठ विधान है व्रत कथाओं से जुड़े थापों का गोबरांकन सुख, स्वास्थ्य और सुमंगल प्रदान करता है कुमारिकाओं का सांझी अनुष्ठान गोबर से ही विविध आकार लिए उभार पाकर प्रतिदिन रंगबिरंगी फूल-पत्तों से सुगंधता है

घर-घर में गोबर के कंडों-छाणों से ही गृहणियां भोजन पकाती हैं बड़ी रसोई दालबाटी भी कंडों पर ही बनती है। कई जगह दाहक्रिया भी कंडों पर की जाती है घर-आंगन की लीपापोती भी गोबर-माटी से की जाती है। दीवाली के महीने भर पहले से यह तैयारी प्रारंभ हो जाती है सुबह तीन चार बजे उठकर कई बार मैं भी अपनी मां के साथ छापरड़े से छाणे बीनने जाता लाल पीली माटी लेने खान पर जाते और उसके पिंडोरे बनाकर रख देते वे दिन एक अलग ही मस्ती के होते

बरसात में जब घर टपकता, तो मां बहुत परेशान होती। थोड़ी-सी बरसात रूकने पर दीवाल के सहारे गोबर और उसकी राख मिलाकर मोटी परत लगाते। इसे रागोबर लगाना कहते, जिससे पानी टपकना बंद हो जाता अपने गांव कानोड़ में न जाने कब से गाय के खूंटो को देख रहा हूं, जो सड़क के एक तरफ किनारे जमीन में गड़े हुए हैं केवल उनका मुख-भाग बाहर निकला हुआ है गांवों में गोबर गोबरी नाम रख मैंने कइयों को बड़ा प्रसन्न होते देखा गोबर गणेश तो गांवों में ही क्यों शहरों में भी मिल जाएंगे अब तो गोबर गैस भी निकल आई है श्रीकृष्ण ने गोचर पर्वत पर खूब गायें चराईं, बांसुरी बजाई वहां गायों का वंशवर्धन हुआ, फलस्वरूप उसका नाम ही गोवर्धन पड़ गया। वह पर्वत जहां गायों ने केलिक्रीड़ा की, कृषि के लिए आवश्यक धनसंपदा दी, परिवारों को भरणपोषण दिया, ग्वालों को सुखदा गृहस्थी दी, ऐसा गोवर्धन गायों के चरने और गोबर से टीला बनते-बनते पहाड़ बन गया, अन्यथा प्रारंभ में तो वहां मैदान ही था

 

दीवाली पर धनवानों के घरों में धनदेवी लक्ष्मी की पूजा होती है, पर पूरे राष्ट्र का धन तो सचमुच में गोबर ही है जो सभी के लिए उपादेय है यह एक ऐसा धन है, जो खजाने का नहीं, बैंक का नहीं, आभूषण किंवा जवाहरात का नहीं पर समग्र जीवन-चक्र का, आम जनता के भरण-पोषण से जुड़ी कृषि सभ्यता का है। यह धन रोटी देता है, कपड़ा देता है और मकान देता है फूलों में सबसे बड़ा फूल कपास देता है, जिससे बने कपड़े से दुनिया अपना तन ढकती है

गोबर सबके लिए उपयोगी, अनिवार्य और अनुपम होने से आजीविका का संबल और जीवन-पोषण का मुख्य स्रोत है अत: गोबर भारत राष्ट्र का उत्कृष्ट धन है दीवाली के त्यौहार पर गोबर के गोवर्धन घर-घर, गांव-गांव बनाए जाते हैं इस गोवर्धन को नये धान-मकई से सजाया जाता है हाथ-पांवों में अनाज के दानों के आभूषण बनाए जाते हैं नई रुई और नये कपास का पहनावा दिया जाता है गले की हांसली और कमर का कंदोरा बनाया जाता है उनके नाभिस्थल पर गन्ने का रोपण किया जाता है। यह प्रतीक है जीवन-रस का, सरसता का, जो घर-घर, गांव-गांव संचरित होता है इस गोवर्धन को फिर गायों से चरवाया जाता है गोवर्धन के पास एक तलैया बनाई जाती है जिसमें दही बिलोया जाता है इस गोवर्धन की पूजा में गीत गाये जाते हैं कुमकुम, चावल, मूंग, दीप, लच्छा, सुपारी एवं पान-पैसे से सजी थाली से गोवर्धन की पूजा में गाया जाता है


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