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REPORT : एक आध्यात्मिक शख्शियत का अवसान, ऐसे भी कोई जाता है तुम ऐसे गए की पता ही नहीं चला

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REPORT : एक आध्यात्मिक शख्शियत का अवसान, ऐसे भी कोई जाता है तुम ऐसे गए की पता ही नहीं चला

नीमच :-

लम्बे समय तक पत्रकारिता से जुड़े रहे और वर्तमान में सहारा इंडिया में राजस्थान के सिरोही में पदस्थ रीजनल मैनेजर अब्दुकल अली ईरानी के पिता शब्बीर भाई ईरानी नहीं रहे उन्होंने ७६ वर्ष की आयु में २ जुलाई की रात्रि २ बजे करीब उदयपुर के अस्पताल में आखरी सांस ली और चले गए 

स्व.शब्बीर भाई ईरानी की पहचान भले यह हो की वे अब्दुल अली ईरानी के पिता थे लेकिन इसके इतर वे ख़ास शख्शियत थे वे बेहद आध्यात्मिक व्यक्ति थे जो उनसे एक बार मिला उनका हो गया जाति तौर पर पांच वक्ता नमाजी और हमेशा से दिन दुखियो की मदद करने का उनका जज़्बा किसी से छुपा नहीं था पिछले कई सालो से वे रमज़ान के महीने में मस्जिद में रोजा इफ्तार कराया करते थे इस बार भी रमजान में २३ वे रोजे तक इस काम को बदस्तूर अंजाम देते रहे 

इस बार एक ख़ास बात यह भी रही की उनके गुठनों में बीते कुछ सालो से दर्द था वे मस्जिद में कुर्सी पर बैठकर नमाज़ अदा करते थे लेकिन इस बार लोगो ने देखा शब्बीर भाई ने कुर्सी छोड़ दी और निचे बैठकर नमाज़ अदा कर रहे है उनके चाहने वालो ने पूछा क्या पाँव का दर्द ठीक हो गया उन्होंने कहा दर्द तो बदस्तूर जारी है लेकिन ख़याल आया की नमाज़ का मतलब खुदा की बारगाह में सजदा है में कुर्सी पर बैठकर नमाज अदा करता हु तो उसकी बारगाह में सजदा अदा होता नहीं इसलिए सोचा भले दर्द हो में नीचे बैठकर ही नमाज पढूंगा 

अध्यात्म में वे काफी गहरे उतरे थे लेकिन उसके साथ वे मजहबी मामलो के बड़े जानकार थे बीते करीब चालीस सालो से वे लगातार स्टडी करते रहे किताबे खरीदना और पढ़ना उनका शोक था स्वभाव अंतर्मुखी था काम ही लोगो से बातचीत करते थे इसलिए दुनिया उनकी खूबियों से वाकिफ नहीं थी उसूल के बेहद पक्के थे और खुद्दारी का आप अंदाज़ा नहीं लगा सकते जीवन में कई उतार चढ़ाव उन्होंने देखे बेहद बुरा वक्त भी देखा लेकिन भूखा सोना उन्हें मंजूर थे पर किसी के सामने कभी अपना दुखड़ा नहीं रोया 

स्व.शब्बीर भाई की बिलकुल फिट थे २३ वे रमजान के बाद अचानक उनकी तबियत बिगड़ी और उन्हें सांस लेने में कठिनाई होने लगी बिमारी की खबर पर अब्दुल अली ईरानी उन्हें लेकर उदयपुर गए जहा वे अस्पताल में भर्ती किये गए हर दिन वे एक ही बात अब्दुल अली से कहते थे मुझे नीमच ले चलो जो होना है वो हो जाएगा लेकिन डाक्टर जूझते रहे और इलाज में कोई कोर कसार नहीं रखीलेकिन शायद उनको इस बात का अंदाजा था की उनके दुनिया में अब दिन पूरे हुए इसलिए वे नीमच आने की जिद्द करते रहे और आखिरकार २ जुलाई की रात्रि दो बजे उन्होंने आखरी सांस ली और चल बसे 

ये खबर जीने भी सुनी उसको भरोसा नहीं हुआ की शब्बीर भाई ईरानी नहीं रहे सभी का कहना था की हम अभी तो मिले थे बिलकुल फिट थे जिसको पता चला उसको रंज हुआ २ जुलाई की सुबह नीमच में उनको सुपुर्दे ख़ाक किया गया आज शाम बोहरा मस्जिद पर तीजे की फातिहा हुयी हर कोई यह कहते सुना गया की ऐसे भी कोई जाता है वो ऐसे गए की पता ही नहीं चला 

अब्दुकल अली ईरानी कहते है ज़िन्दगी भर परिवार के लिए संघर्ष करते और ऐसे चले गए की खिदमत का मौका भी नहीं दिया वे हमें छोड़ गए लेकिन उनकी दी हुयी तालीम पीढ़ियों तक हमें रास्ता बताती रहेगी 

स्व.शब्बीर भाई ईरानी की शोक की बैठक उनके बँगला नंबर ४७ ( खुर्शीद टाकीज के पीछे ) स्थित निवास पर सुबह १० बजे से दोपहर १ बजे तक आने वाले नो दिनों तक चलेगी
 


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