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NEWS: पत्रकार पंकज मलिक के कलम से, ये मौका था फिर से जिंदा होने का.. पर परिवारवाद ने इसे भी गवा दिया, पढें खबर

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NEWS: पत्रकार पंकज मलिक के कलम से, ये मौका था फिर से जिंदा होने का.. पर परिवारवाद ने इसे भी गवा दिया, पढें खबर

नीमच :-

कांग्रेस ने एक और मौका खो दिया, परिवारवाद की राजनीति कांग्रेस पर फिर हावी रही, कांग्रेस के पास एक बहुत ही अच्छा मौका था देश के सामने एक नया आदर्श प्रस्तुत करने का, नैतिकता के नाते राहुल गांधी को तो इस्तीफा देना ही था, साथ ही गांधी परिवार के किसी भी सदस्य को राष्ट्रीय राजनीति में किसी पद पर रहने का अधिकार नहीं था।

नैतिकता के नाते उन्हें अपना बड़प्पन बताते हुए किसी और को राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए नामांकित करना था और निर्वाचित भी, हालांकि तब भी कमान गांधी परिवार के पास ही रहती क्योंकि जो भी अध्यक्ष बनता वह या तो गांधी परिवार का चहेता होता या उनके इशारो पर चलने वाला होता, यह सभी को पता था।
प्रधानमंत्री के मामले में भी सोनिया गांधी के इस निर्णय ने यह बता दिया था कि मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाकर उन्होंने अपने पद का त्याग नहीं किया था बल्कि उनकी हां में हां मिलाने वाले नेता को प्रधानमंत्री बनाकर अपनी सत्ता कायम रखी थी और कांग्रेस के पास तब जबकि कांग्रेस  की लोकप्रियता का ग्राफ दिनोदिन गिरता जा रहा है तब आज उसके पास एक बहुत अच्छा मौका था, देश की राजनीति में फिर से वापसी करने का और उसने अपना मौका फिर से गवा दिया,क्योंकि यहां किसी और को आगे देखना पारिवारिक राजनीति में शायद उन्हें पसंद नहीं था। उसी की परिणिति रही कि इतने दिनों से चल रहा गतिरोध cwc मीटिंग के बाद भी उसी जगह का कायम रहा जहां से इस गतिरोध की शुरुआत हुई थी।

अपने आप को आदर्श रूप में दिखाने वाले गांधी परिवार जिन्होंने पहले घोषणा की थी कि कोई भी गांधी परिवार का सदस्य मुख्यधारा में नहीं आएगा, साथ ही उन्होंने सीडब्ल्यूसी मीटिंग से किनारा कर के जताने का प्रयास किया था कि गांधी परिवार का अध्यक्ष के चयन में कोई योगदान नहीं रहेगा पर खुद आगे रहकर अंतरिम अध्यक्ष के पद को स्वीकार करना भी सोनिया गांधी के लिए लोहे के चने चबाने जैसा साबित होगा और गांधी परिवार के चाटुकार नेताओ की कांग्रेस में तो कमी नहीं है, यह सुरजेवाला के इस बयान से भी पता चलता है, जिसमें उन्होंने राहुल गांधी का पक्ष लेते हुए कहा है कि राहुल गांधी ने नैतिकता के नाते अध्यक्ष बनने से इनकार किया है। यह कोई बड़ी बात नहीं है यह हर अध्यक्ष का दायित्व बनता है कि अगर वह हर प्रयास के बाद भी केवल असफलता ही प्राप्त कर रहा हो तो उसका अध्यक्ष पद पर बने रहना किसी भी कीमत में सही नहीं है, कांग्रेस के पास काफी चेहरे थे पर गांधी परिवार राहुल गांधी के समकक्ष किसी भी नए चेहरे को या प्रभावी चेहरे को सामने लाकर भविष्य के लिए खुद के लिए चुनौती पैदा नहीं कर सकता,इसलिए गांधी परिवार ने सभी युवा चेहरों को दरकिनार कर जो अंतिम सूची तैयार की थी उसमें भी वरिष्ठ कांग्रेसी नेता थे,जिन्हें गांधी परिवार का वरदहस्त हासिल है, जबकि देश की समय की मांग के अनुसार कांग्रेस को युवा नेतृत्व की जरूरत है जो कि सही रास्ते पर कांग्रेस को ले जा सके,जो मृतप्रायः पड़ी कांग्रेस में फिर से जान डाल सके,पर गांधी परिवार ने यहां खुद को साबित करने की कोशिश में खुद को ही काफी पीछे छोड़ दिया।

आम जनता के मन में कांग्रेस की साख काफी धूमिल हुई है,गांधी परिवार को वास्तव में इन चुनावों से कोई लेना देना नहीं रख कर अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए बाकी सदस्यों पर निर्णय छोड़ देना था और लोकतांत्रिक प्रणाली से अध्यक्ष का चुनाव कराना था, जो कि कांग्रेस में एक नई जान फुकने का माद्दा रखताऔर अभी तो  विपक्ष के रूप में भी कांग्रेस को एक दमदार नेतृत्व की जरूरत थी और उसके लिए कांग्रेस में ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट जैसे युवा और प्रभावी चेहरे मौजूद थे, जिसे कांग्रेस ने दरकिनार कर फिर से सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बना कर यह साबित कर दिया है कि कांग्रेस पार्टी की धुरी केवल गांधी परिवार पर ही घूमती है और गांधी परिवार के बिना कांग्रेस का कोई वजूद नहीं है और वास्तव में जब गांधी परिवार नहीं रहेगा तब कांग्रेस का वजूद स्वतः ही समाप्त हो जाएगा, कांग्रेस तब रहेगी ही नही।
 इस हिसाब से देखा जाए तो कांग्रेस पार्टी का नाम बदलकर केवल गांधी पार्टी कर देना चाहिए, ताकि सभी को यह अंदाज रहे ही कांग्रेस की सत्ता संभालने का हक अगर किसी को है तो केवल गांधी परिवार को ही है इसके अलावा कांग्रेस को कोई भी फलीभूत नहीं कर सकता है हालांकि कांग्रेस अभी उस स्थिति में भी नहीं है कि विपक्ष की भूमिका भी अच्छे से निभा सके,पर फिर भी उसे अपने अध्यक्ष के चुनाव में पारदर्शिता रखकर देश की जनता के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत करना था ताकि कांग्रेस पर जो गांधी परिवार का ठप्पा लगा है ,उसकी छाप हट जाती पर अब जबकि सोनिया गांधी ने स्वयं अंतरिम अध्यक्ष के पद का चुनाव किया है तो ये अंदाज लगा लेना आसान है कि आगे रहना और नेतृत्व करने की गांधी परिवार की इच्छाशक्ति वैसी ही है जो पहले थी।अब कांग्रेस के चाटुकार नेताओ को भी वास्तविकता से रूबरू होना चाहिए,देखिए क्या हश्र हुआ है आपकी पार्टी का,संभल जाइये वक़्त अभी भी है,जी हुजूरी छोड़िये सच से सामना कराइये अपने नेतृत्व को,नही तो सब कुछ चला जायेगा।

मैं तो बस अब इतना ही कहूंगा कि
अब तो बदल जाइये ,वक़्त भी बदल गया है।

#कांग्रेस #अध्यक्ष #चुनाव


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