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July 3, 2023, 10:41 am
BIG REPORT : जिला कांग्रेस उद्योग एवं व्यापार प्रकोष्ठ के जिलाध्यक्ष मित्तल ने लगाया सरकार पर आरोप, बोले- देश के व्यापारियों को कर रहे परेशान, पढ़े खबर 

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नीमच। जिला कांग्रेस उद्योग एवं व्यापार प्रकोष्ठ के जिलाध्यक्ष कमल मित्तल ने सरकार पर आरोप लगाते हुए बताया कि देश का व्यापारी इस गब्बर सिंह टैक्स से काफी परेशानी महसूस कर रहा है आज 1 जुलाई 2023 को जीएसटी लागू किए 6 साल हो गए है , एक देश एक कर के नारे के साथ जीएसटी लागू कीया गया था ,आज व्यापारी भाई को चिंतन करना चाहिए की क्या है जीएसटी , ये जीएसटी नहीं ये ये गब्बर सिंह टैक्स है, सरकार व्यापारी पर जुल्म कर रही है धमका रही है और अन्याय से हमारी मेहनत का रुपया छिन कर ले जा रही है ठीक डाकु गब्बरसिंह की तरह। जजजीएसटी नहीं ये ये गब्बर सिंह टैक्स है, सरकार व्यापारी पर जुल्म कर रही है धमका रही है और अन्याय से हमारी मेहनत का रुपया छिन कर ले जा रही है ठीक डाकु गब्बरसिंह की तरह। ऊपर से अधिकारी आकर धमकाते हैं। कभी चेकिंग तो कभी सत्यापन के नाम पर धमकी का दौर शुरू हो जाता है।

जीएसटी की मनमानियों की झलकियां-
- व्यापारी पर प्रक्रिया का बोझ और खर्च बढ़ा दिया गया है, हर महीने दो-तीन रिटर्न जमा करना है। फिर वार्षिक रिटर्न अलग, ई-वे बिल से लेकर ई-इनवायस तक का पालन जरुरी। कुल मिलाकर व्यापारी को सरकार सिर्फ चोर ही समझ रही है। छोटे व्यापारी को सीए, अकाउंट से लेकर कम्प्यूटर और साफ्टवेयर पर खर्च अलग करना है और समय भी बर्बाद करना है।
-जीएसटी में रिटर्न में त्रुटी सुधार या संशोधन की सुविधा अब तक नहीं मिली है। जबकि यह मौलिक जरुरत है। स्थानीय अधिकारियों से लेकर काउंसिल तक के सामने छह वर्षों से यह मांग देश के तमाम कर विशेषज्ञ व व्यापारी कर रहे हैं। इसके बावजूद अब तक इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा।
-इस कर प्रणाली को लागू करने के साथ ही किए गए वादे और दावे अब तक भी अधूरे हैं।न तो स्टार रेटिंग का सिस्टम लागू हो सका ना ही विवादों की सुनवाई के लिए ट्रिब्यूनल गठित हो सका।
- हाल ये है कि टैक्स चोरी और बोगस बिल बनाने वालों पर तो जीएसटी काउंसिल और विभाग कार्रवाई नहीं करता ईमानदार व्यापारी जो माल खरीदता है उसका क्रेडिट रोका जाता है और उस पर कार्रवाई होती है
- ये किस कानून में होता है कि चोरी कोई और करे और सजा किसी और को दी जाए। जीएसटी में यदि विक्रेता व्यापारी टैक्स नहीं भरता तो खरीदार व्यापारी पर कार्रवाई होती है जिसने खरीदी करते समय ही कीमत और टैक्स का पैसा बेचवाल व्यापारी को पूरा भुगतान कर दिया है।
- सरकार अब ई-इनवायस की सीमा और घटा रही है। अगस्त से 5 करोड़ वार्षिक टर्नओवर पर ई-इनवायस लागू किया जा रहा है। अगली एक जनवरी से इसे डेढ़ करोड़ के टर्नओवर पर लागू किया जा रहा है। यह सरासर अन्याय है। हर छोटा मध्यम व्यापारी ई-इनवायस के जाल में उलझेगा। वह व्यापार ही नहीं कर सकेगा
-रियल एस्टेट प्रोजेक्ट पर लगाए जा रहे कर के निर्धारण के लिए जमीन की कीमत का फार्मूला इंदौर-भोपाल हो या झाबुआ सभी के लिए एक ही है। किसी भी प्रोजेक्ट की लागत में एक तिहाई जमीन का खर्च माना जा रहा है। शेष राशि पर जीएसटी लगाई जा रही है। नीमच मंदसौर रतलाम इंदौर-भोपाल या अन्य शहरों या पाश इलाकों में जमीन महंगी होती है ऐसे में जमीन का प्रोजेक्ट अनुपात प्रोजेक्ट में अलग-अलग होता है। जमीन के पंजीयन मूल्य के हिसाब से जीएसटी क्यों नहीं लगाया जा रहा
- अधिकारी मनमानी कर कभी भी किसी का भी पंजीयन सस्पेंड कर देते हैं। यह तरीका बन गया है कि व्यापारी को अपने पास बुलाओ और सौदा करो
-सेंट्रल जीएसटी में पंजीयन की मनमानी व्यवस्था लागू कर दी गई है। एक शहर के व्यापारी का पंजीयन किसी दूसरे शहर के अधिकारी को दिया जा रहा है। नतीजा कई कई सप्ताहों तक पंजीयन नहीं मिल रहा
- जीएसटी में व्यापारी से 18 प्रतिशत ब्याज विभाग वसूलता है और खुद रिफंड पर 6 प्रतिशत ब्याज देता है
- छह साल में भी जीएसटी ट्रिब्यूनल की स्थापना नहीं की गई इससे व्यापारी को सस्ता सुलभ न्याय नहीं मिल रहा। विभाग की मनमानी सहना पड़ रही है। ऊपर से अधिकारी आकर धमकाते हैं। कभी चेकिंग तो कभी सत्यापन के नाम पर धमकी का दौर शुरू हो जाता है।

जीएसटी की मनमानियों की झलकियां-
- व्यापारी पर प्रक्रिया का बोझ और खर्च बढ़ा दिया गया है, हर महीने दो-तीन रिटर्न जमा करना है। फिर वार्षिक रिटर्न अलग, ई-वे बिल से लेकर ई-इनवायस तक का पालन जरुरी। कुल मिलाकर व्यापारी को सरकार सिर्फ चोर ही समझ रही है। छोटे व्यापारी को सीए, अकाउंट से लेकर कम्प्यूटर और साफ्टवेयर पर खर्च अलग करना है और समय भी बर्बाद करना है।
-जीएसटी में रिटर्न में त्रुटी सुधार या संशोधन की सुविधा अब तक नहीं मिली है। जबकि यह मौलिक जरुरत है। स्थानीय अधिकारियों से लेकर काउंसिल तक के सामने छह वर्षों से यह मांग देश के तमाम कर विशेषज्ञ व व्यापारी कर रहे हैं। इसके बावजूद अब तक इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा।
-इस कर प्रणाली को लागू करने के साथ ही किए गए वादे और दावे अब तक भी अधूरे हैं।न तो स्टार रेटिंग का सिस्टम लागू हो सका ना ही विवादों की सुनवाई के लिए ट्रिब्यूनल गठित हो सका।
- हाल ये है कि टैक्स चोरी और बोगस बिल बनाने वालों पर तो जीएसटी काउंसिल और विभाग कार्रवाई नहीं करता ईमानदार व्यापारी जो माल खरीदता है उसका क्रेडिट रोका जाता है और उस पर कार्रवाई होती है
- ये किस कानून में होता है कि चोरी कोई और करे और सजा किसी और को दी जाए। जीएसटी में यदि विक्रेता व्यापारी टैक्स नहीं भरता तो खरीदार व्यापारी पर कार्रवाई होती है जिसने खरीदी करते समय ही कीमत और टैक्स का पैसा बेचवाल व्यापारी को पूरा भुगतान कर दिया है।
- सरकार अब ई-इनवायस की सीमा और घटा रही है। अगस्त से 5 करोड़ वार्षिक टर्नओवर पर ई-इनवायस लागू किया जा रहा है। अगली एक जनवरी से इसे डेढ़ करोड़ के टर्नओवर पर लागू किया जा रहा है। यह सरासर अन्याय है। हर छोटा मध्यम व्यापारी ई-इनवायस के जाल में उलझेगा। वह व्यापार ही नहीं कर सकेगा
-रियल एस्टेट प्रोजेक्ट पर लगाए जा रहे कर के निर्धारण के लिए जमीन की कीमत का फार्मूला नीमच मंदसौर रतलाम इंदौर-भोपाल हो या झाबुआ सभी के लिए एक ही है। किसी भी प्रोजेक्ट की लागत में एक तिहाई जमीन का खर्च माना जा रहा है। शेष राशि पर जीएसटी लगाई जा रही है। नीमच मंदसौर रतलाम इंदौर-भोपाल या अन्य शहरों या पाश इलाकों में जमीन महंगी होती है ऐसे में जमीन का प्रोजेक्ट अनुपात प्रोजेक्ट में अलग-अलग होता है। जमीन के पंजीयन मूल्य के हिसाब से जीएसटी क्यों नहीं लगाया जा रहा
- अधिकारी मनमानी कर कभी भी किसी का भी पंजीयन सस्पेंड कर देते हैं। यह तरीका बन गया है कि व्यापारी को अपने पास बुलाओ और सौदा करो
-सेंट्रल जीएसटी में पंजीयन की मनमानी व्यवस्था लागू कर दी गई है। एक शहर के व्यापारी का पंजीयन किसी दूसरे शहर के अधिकारी को दिया जा रहा है। नतीजा कई कई सप्ताहों तक पंजीयन नहीं मिल रहा
- जीएसटी में व्यापारी से 18 प्रतिशत ब्याज विभाग वसूलता है और खुद रिफंड पर 6 प्रतिशत ब्याज देता है
- छह साल में भी जीएसटी ट्रिब्यूनल की स्थापना नहीं की गई इससे व्यापारी को सस्ता सुलभ न्याय नहीं मिल रहा। विभाग की मनमानी सहना पड़ रही है। 

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