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November 11, 2023, 11:02 am
KHABAR : जीवन कैसे जीना है यह सभी धर्म सीखाते हैं लेकिन मरना कैसे है यह सिर्फ शास्त्र ने सिखाया है, आराधना भवन में आयोजित धर्मसभा में आचार्य प्रसन्नचंद्र सागर जी मसा ने दिए उपदेश, पढ़े खबर 

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नीमच। जीवन कैसे जीना है यह सभी धर्म सीखाते हैं लेकिन मरना कैसे है यह सिर्फ शास्त्र ने सिखाया है।आज व्यक्ति का जन्म भी अस्पताल में हो रहा है और मृत्यु भी अस्पताल में हो रही है ।हम जीवन में सारे जतन कर लेते हैं लेकिन संयम की प्राप्ति नहीं होती है। क्योंकि संयम के लिए चरित्र निर्माण आवश्यक है। कंजूस व्यक्ति का जैसे घ्1 भी खराब नहीं होता है वैसे ही संयम का 1 मिनट भी बर्बाद नहीं होना चाहिए।मनुष्य को बचपन से ही हर क्षण परमात्मा की भक्ति करना चाहिए एक पल भी व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।मनुष्य जीवन का अंतिम समय परमात्मा की भक्ति में ही निकलना चाहिए तभी उसकी आत्मा का कल्याण हो सकता है।

यह बातश्री जैन श्वेतांबर भीड़भंजन पार्श्वनाथ मंदिर ट्रस्ट श्री संघ नीमच के तत्वावधान में बंधू बेलडी पूज्य आचार्य श्री जिनचंद्र सागरजी मसा के शिष्य रत्न नूतन आचार्य श्री प्रसन्नचंद्र सागरजी मसा ने कही। वे चातुर्मास में मिडिल स्कूल मैदान के समीप जैन आराधना भवन में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि चरित्र जीवन के लिए योग्य समय व्यक्ति और स्थल जरूरी है। मरते वक्त भी मनुष्य को अस्पताल में पीड़ा भोगनी पड़ती है। वह अपने परिवार के सदस्यों से भी नहीं मिल पाता। हमें कम से काम अंतिम समय में दुनिया से नाता तोड़कर प्रभु से नाता जोड़ना चाहिए ।

आचार्य श्री ने कहा कि योग्य स्थल समय सानिध्य स्वच्छता और शुद्ध यह पांच चीज हमारे हाथ में नहीं है। यह सभी प्रभु के हाथ में है इसलिए हमें प्रभु से प्रार्थना करना चाहिए कि प्रभु इस काया से में मुक्त बनु उसके पहले मोह माया महत्व से मुक्त हो सकूं इसके माध्यम से ही इन पांच चीजों के मालिक बन सकते हैं।हम दीक्षा नहीं ले सकते तो कोई बात नहीं लेकिन साधुता के प्रति आदर भाव होना चाहिए साधु श्रावक के उपदेश पर चले तो उसके जीवन का कल्याण हो सकता है। जीवन के अंतिम समय में व्यक्ति की जहां आसक्ति ज्यादा रहती है उसका जन्म उसी तरह वहीं वापस होता है। इसलिए हमें प्रभु भक्ति की आराधना के साथ अंतिम समय व्यतीत करना चाहिए। आत्मा का कल्याण करना है तो 12 महावृत का पालन करना चाहिए।साधु संत बनना है तो नरक के दुख सहन करने की शक्ति भी होना चाहिए।साधु संत बनना हो तो  झूठ नहीं बोलना चाहिए ।सदैव सत्य बोलना चाहिए।शरीर की वेदना की औषधि मिल सकती है लेकिन आत्मा की वेदना की औषधि संयम नियम पालन ही है। साधु जीवन चलता फिरता कल्पवृक्ष होता है। 

श्री संघ अध्यक्ष अनिल नागौरी  ने बताया कि धर्मसभा में तपस्वी मुनिराज श्री पावनचंद्र सागरजी मसा एवं पूज्य साध्वीजी श्री चंद्रकला श्रीजी मसा की शिष्या श्री भद्रपूर्णा श्रीजी मसा आदि ठाणा 4 का भी  चातुर्मासिक सानिध्य मिला। समाज जनों ने उत्साह के साथ भाग लिया। उपवास, एकासना, बियासना, आयम्बिल, तेला, आदि तपस्या के ठाठ लग रहे है। धर्मसभा में जावद ,जीरन, मनासा, नयागांव, जमुनिया,जावी, आदि क्षेत्रों से श्रद्धालु भक्त  सहभागी बने।धर्मसभा का संचालन सचिव मनीष कोठारी ने किया।

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