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December 14, 2023, 7:31 pm
BIG NEWS : आरएसएस और केंद्रीय नेतृत्व की प्लानिंग को समझ नही पाए बड़े नेता, अब सब खाली हाथ, सफल हुआ "ऑपरेशन कायाकल्प", अपना गुट बनाकर जिनके टिकट लाये थे क्षत्रप, वे सब एक ही झटके में हुए "लावारिस", अब "दिल्ली" के इशारे से चलेंगे मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, पढ़े संजय खाबिया की खबर

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चित्तौड़गढ़। जरूरी हो गया था ऑपरेशन कायाकल्प। नही होता तो पार्टी की देह ही नही आत्मा भी तेजी से कमजोर होती जा रही थी। सत्ता के दौर-शोर में वे सिद्धांत पीछे छूटते जा रहे थे जिनसे देह ओर आत्मा की दमक, पहचान बनी थी। बदमानी हो रही थी वो अलग। कायाकल्प आसान भी नही था। पेशेंट को बताए बगैर करना कोई आसान काम था क्या? लेकिन ऑपरेशन सफल हुआ। अब गम्भीर रोग से ग्रसित तमाम पेशेंट, पेशन्स के साथ बड़े डाक्टरों की इस डॉक्टरी को देख-समझ-महसूस कर रहे हे कि बगैर चीरा फाड़ी के ये कैसा ऑपरेशन हो गया कि रत्तीभर भी लहू का कतरा बाहर नही आया। अब उन्हें कौन बताए कि ये लिथरोट्रेप्सी पद्धति से हुआ ऑपरेशन है। जिसमे बदन नही उघाड़ा जाता। लेज़र किरणों से काम हो जाता हैं। ऑपरेशन कायाकल्प भी ऐसा ही हुआ। घर की बात घर मे ही रह गई और इलाज भी हो गया। किसी भी राज्य में संगठन की जांघ नही उघड़ी। अन्यथा 2024 के पूर्ण विजय संकल्प के पहले लेने के देने हो जाते।

मरुभूमि राजस्थान में भजनलाल की ताजपोशी के साथ आरएसएस और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का बहुप्रतीक्षित ऑपरेशन कायाकल्प मुक्कमल हुआ। ये ऑपरेशन भाजपा में प्रवेश कर गई उन बीमारियों का था, जो देर सबेर पार्टी का हश्र कांग्रेस जैसा कर देती। सत्ता की निरंतरता के कारण इस बीमारी ने पार्टी में जगह बना ली थी। स्थापित नेता, नेतृत्व से बड़े हो गए थे। अपने अपने गुट, अपने अपने लाड़ के विधायक, मंत्री, पार्षद तय हो गए थे। सत्ता, पूरी तरह संगठन पर हावी हो चली थी। संगठन के दायित्व औऱ पद भी सत्ता-सरकार तय करने लगी थी। यहां तक कि मण्डल अध्यक्ष जैसी अहम कड़ी भी विधायको के हवाले हो गई थी। विधायकों की पसन्द, नापसन्द से ही पार्षद, एमआईसी से लेकर निगम प्राधिकरण के पद तय होने लगे थे। क्षत्रप सर्वशक्तिमान हो गए थे और उपकृत वो ही हो रहे थे जो बड़े नेताओं के खास थे। जमीनी कार्यकर्ता, ज़मीन पर ही थे। अब वे सब जमीन पर है, जिनके पैर जमीन से ऊपर हो गए थे। 

संघ ने बड़े ही धैर्य और धीरज से इस ऑपरेशन कायाकल्प को अंजाम दिया गया। इसकी रत्तीभर भी भनक राज्यो में स्थापित नेताओ को नही लग पाई। जो पद पर थे, वे इसे चुनाव जीतने की एक्सरसाइज मानते रहे और जो दायित्व पर नही थे, वे इस ऑपरेशन को अपने लिए सत्ता सुख की नजर से देखते रहें। इन्हें लगा कि नेतृत्व स्थापित नेताओ की मुश्के कस रहा हैं और अब अगली बारी हमारी। लेकिन ऐसा हुआ नही। स्थापित नेतृत्व तो हाशिये पर किया ही गया, सत्ता को लालायित नेता भी नेपथ्य में धकेल दिए गए। बड़े नेता आरएसएस और केंद्रीय नेतृव की प्लानिंग को समझ ही नही पाए और अब सब खाली हाथ हैं। 

भरी जवानी में नरेंद्र सिंह तोमर वयोवृद्ध करार दे दिए गए और स्पीकर बना दिये गए। प्रहलाद पटेल, ज्योति सिंधिया, राकेश सिंह, गोपाल भार्गव सन्न रह गए। किसी को गुमान नही था कि ऐसा कुछ होगा? अब सबकी हालत ऐसी हो गई कि नेतृव पद दे भी तो हाथ झटक रहे हैं। कारण अधीनस्थ के अधीन कैसे काम करे, इज्जत बचाये। तमाम क्षत्रप केंद्रीय नेतृत्व के रहमोकरम पर निर्भर हो गए। संगठन के दायित्व के कारण कैलाश विजयवर्गीय जरूर अप्रभावित रहे। वे राष्ट्रीय महासचिव पद पर है, जो भाजपा में एक मुख्यमंत्री से भी बड़ा पद माना जाता हैं। विजयवर्गीय जिस काम के लिए एमपी भेजे गये थे, उन्होंने वो पूरी शिद्दत कर दिया। विजयवर्गीय मिशन 2023 में दिल्ली दरबार के आंख, कान औऱ नाक की भूमिका में थे। वीडी की मुस्कुराहट भी बता रही है कि वे भी दिल्ली की कसौटी पर खरे उतरे। इसलिए अब तक उनका दायित्व अप्रभावित हैं और उम्मीद है कि वे इस पद पर बने रहेंगे। 

केंद्रीय नेतृत्व और आरएसएस राज्यो  में बढ़ती गुटबाजी औऱ क्षत्रपों के तेजी से बढ़ते आधिपत्य से तंग आ चुके थे। हालात इस कदर बिगड़ गए थे कि चाह कर भी वे हालात दुरुस्त नही कर पा रहे थे। सत्ता की निरंतरता ने राज्यो के बड़े नेताओं को इतना बड़ा बना दिया था कि वे एक तरह से अपने अपने राज्यो में समानांतर भाजपा हो चले थे। मध्यप्रदेश इसका ज्वलंत उदाहरण बनकर उभरा जहां केंद्रीय नेतृत्व, आखरी समय तक राज्य के नेतृव को बदलने की हिम्मत नही जुटा पाया। उल्टे उसे चलते चुनाव में वो सब स्वीकार करना पड़ा, जो वो नही चाहता था। केंद्रीय नेतृत्व की मंशा तो मिशन 2023 में ही पार्टी में पीढ़ी परिवर्तन की थी लेकिन राज्यो के स्थापित नेतृत्व के समक्ष उसे झुकना पड़ा। नतीज़तन पसंद के टिकट जारी करना ही पड़े। पसन्द के टिकट की जिद भी उसी रणनीति का हिस्सा थी जो सत्ता पर अखण्ड पकड़ से जुड़ी थी। नेतृत्व ने ऐसे सभी लाडले औऱ लाड़लियों को एक ही झटके में लावारिस कर दिया। उनके उस नेता को ही घर बैठा दिया जिसके दम पर वे टिकट लाये थे और भविष्य के सपने बुनकर बैठे थे। 

अब मध्यप्रदेश सहित तीनो राज्यो में सत्ता के शीर्ष पर मनोहरलाल हैं। यानी आरएसएस और केंद्रीय नेतृव की पसंद के नेता। नेता भी सब लो-प्रोफाइल। संघ और संगठन के फरमाबरदार। शुद्ध संघ पृष्ठभूमि के। केंद्रीय नेतृव के समक्ष नतमस्तक भाव से ओतप्रोत। हालांकि सत्ता अपने साथ विकृति लाती हैं लेकिन उसके लिए वक्त लगता हैं। निगरानी पूरे समय दिल्ली की रहना ही है। जो नेतृव राज्यो को दिए गए है, वे मोहन-विष्णु-भजन भरोसे नहीं छोड़े जाएंगे। वे दिल्ली दरबार की नजर में वैसे ही रहँगे जैसे सीसीटीवी कैमरे की निगरानी आपकी हमारी मिल्कियत। ये तीन सीएम भी तो एक तरह से संघ परिवार की मिल्कियत ही हैं, जिन्हें बड़े जतन से स्थापित नेताओ की भीड़ में से निकालकर लाये हैं। 

बतौर मिल्कियत अभी ये ताजे ताजे तमाम मनोहरलाल दिल्ली के इशारे पर ही दक्ष-आरमः करेंगे। प्र-चल भी तब ही करेंगे जब इशारा होगा। अन्यथा उपविष ही रहँगे। वाम वृत और दक्षिण वृत का तो सवाल ही नही उठता। ये तमाम शब्द आरएसएस की शाखा कार्यनीति का हिस्सा है, जो सभी मनोहरलाल अच्छे से समझते हैं और वे भी समझ रहे है जो मुहाने पर आकर मनोहरलाल बनते-बनते रह गए।

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