रतलाम। नव वर्ष का शैक्षणिक सत्र प्रारंभ होने जा रहा है, गर्मी की तीव्रता के कारण थोड़ा और समय मिल गया खेलने और मौज मस्तियां करने का पर अब छुट्टीयों के बिताने के बाद बच्चों को स्कूल एक जैल की तरह लगने लगेगा, पर स्कूल तो जाना ही है। स्कूल शुरू होने के साथ ही तीन जगह बोझ बढ़ने वाला है। पहला जेब पर हर साल की तरह इस बार भी हर जिले में सोशल मीडिया और स्थानीय अखबारों ने अपने अखबार में स्कूल की किताबों और स्टेशनरी की बढ़ती कीमतों को लेकर दबी-दबी से आवाज़ उठाई है, जिसका कोई खास असर देखने में नहीं आएगा क्योंकि नीट जैसे मामले पर कान में तेल डालकर सोए जिम्मेदार स्कूल प्रबंधन और दुकानदारों की सांठ-गांठ पर अपना समय नहीं गवाना चाहेंगे। बढ़ती महंगाई में पालक की जेब पर बच्चों की स्कूल सामग्री का बोझ आना ही है और लम्बे समय से इस समस्या से जूझ रहे पालक कहीं न कहीं अब इस बात के लिए मनमसोसकर अपने खर्चाे में कमी कर बच्चें के भविष्य के लिए अपनी खुशियों की कुर्बानी की तैयारी कर चुके हैं। दूसरा बोझ कन्धे पर स्कूल के टाईम टेबल के हिसाब से कोर्स की किताबे उठाकर ले जाने वाले बच्चे अब कई सारी अनावश्यक चीज़ों का भी बोझ अपने कन्धे पर उठाकर ले जाते हैं, जैसे आर्ट, क्राफ्ट, प्रेक्टिकल, प्रोजेक्ट। स्कूल को भी बच्चों को पढ़ाई में रूचि लाने के लिए इन विषयों की आवश्यकता है पर इस पर बच्चों का खासा रूझान बच्चों के ही कन्धे का वज़न अधिक बड़ा रहा है जिस पर स्कूल प्रबंधनों को ध्यान देने की आवश्यकता है। तीसरा है अन्य विषय या ट्युशन का अपने बच्चों को सबसे आगे लाने के चक्कर में कई पालक बच्चों पर ट्युशन का बोझ भी शुरू से ही डाल देते हैं कुछ तो स्कूल से आते ही कुछ मिनिट का ब्रेक भी बराबर से नहीं लेने देते और ट्युशन भेजने के चक्कर में मानसिक रूप से बच्चों पर बोझ डाल देते हैं। जिसमें उर्दू या अरबी को सीखने वाले छात्र-छात्राऐं दुविधा में पड़ जाते हैं कि आखिर उन्हे फोकस करना है तो किस पर करें। स्कूल हो या मदरसा दोनों जगह समय पर पहुंचना आवश्यक है। स्कूल का समय सभी छात्रों के लिए एक समान है पर मदरसों में वहीं बच्चे जाते हैं जो उर्दू या दीनी तालीम हासिल करना चाहते हैं ऐसे में मदरसों को पालको से बात कर समय में परिवर्तन लाना बच्चों के मानसिक एवं भौतिक विकास के लिए आवश्यक है। हम यदि बच्चों में अपने समाज की रीत, संस्कार और अच्छी शिक्षा का भण्डार भरना चाहते हैं तो उन्हे खेलकूद के साथ थोड़ा आराम और व्यायाम का समय भी देना होगा, केवल भीड़ और आगे बढ़ने के इस परिवेश में यह पालक और प्रबंधक दोनो को सोचना होगा की आने वाले समय के लिए जिन पौधों को हम तैयार कर रहे हैं क्या वह सही मार्गदर्शन और वातावरण में बड़े होकर एक पेड़ बनकर फल देंगे या फिर अन्य पौधों की तरह बगिचे में सज कर रह जाऐंगे।