शाजापुर। डे केयर सेंटर तिलक मंदिर, शाजापुर में संत गाडगे निर्वाण महोत्सव पर व्याख्यान एवं काव्य संगोष्ठी का भव्य आयोजन हुआ। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि, वक्ता, और साहित्यकारों ने संत गाडगे महाराज के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए सामाजिक समरसता, स्वच्छता, और जातिगत भेदभाव मिटाने में उनके योगदान को रेखांकित किया।
मुख्य अतिथि सेवानिवृत्त थाना प्रभारी अवधेश कुमार शेषा ने कहा कि संत गाडगे महाराज ने अपने जीवन को समाज की सेवा और स्वच्छता के लिए समर्पित कर दिया। उनकी शिक्षाएँ आज भी समाज को जागरूक करती हैं।
कार्यक्रम अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार डॉ जगदीश भावसार ने कहा कि संत गाडगे का योगदान यह सिखाता है कि सामाजिक एकता केवल कर्म और सेवा से संभव है।
विशेष अतिथि पैंशनर संघ के अध्यक्ष राजेंद्र रिणवा ने कहा कि उन्होंने स्वच्छता और सामाजिक सेवा को अपने जीवन का आधार बनाकर समाज सुधार के व्यावहारिक आदर्श प्रस्तुत किए।
व्याख्यान में वक्ता वरिष्ठ साहित्यकार योगेश उपाध्याय ने कहा कि संत गाडगे बाबा की कर्मयोगी साधना ने वंचित समाज को जागरूक कर सामाजिक समरसता की स्थापना की। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों जैसे अंधविश्वास, जातिगत भेदभाव, बाल-विवाह, और अशिक्षा के विरुद्ध भजनों के माध्यम से जन-जागृति फैलाई।
व्याख्यान में वक्ता रही वरिष्ठ कवयित्री संतोष शर्मा ने संत गाडगे के जीवन दृष्टांत देते हुए कहा कि संत गाडगे का जीवन समाज के हर व्यक्ति को मानवता, करुणा और समानता की प्रेरणा देता है। संत गाडगे महाराज स्वयं अशिक्षित होकर भी शिक्षा के महत्व को समझते थे। उन्होंने समाज को कर्मयोग और शिक्षा का महत्व सिखाया।
अखिल भारतीय साहित्य परिषद के अध्यक्ष, प्रेरक वक्ता एवं कवि जितेंद्र देवतवाल श्ज्वलंतश् ने कहा कि संत गाडगे अपने कीर्तनों के माध्यम से सामाजिक विकृतियों पर तीखा प्रहार करते। उन्होंने अपने भजनों के माध्यम से समाज को जागरूक किया।ष् तथा कवि ज्वलंत ने कविता प्रस्तुत की
ष्सबके दुखड़े दूर करने में जिंदगी गुजारी,
धन्य! धन्य! मानवता के महान पुजारी।
संचालक एवं समीक्षक वरिष्ठ साहित्यकार कैलाश गोंड ने कहा कि समाज ने उनको पूजा है जो एन वक्त पर अपना राजपाट छोड़कर चले गए। संत गाडगे महाराज अनपढ परन्तु महाज्ञानी, उन्होंने इस देश की समाज व्यवस्था की, लोगों की मानसिकता, उनके आचार विचार और सामाजिक क्रांति की ढेर सारी अलिखित किताबें समाज में रहकर पडी थी, जिनकी समझ बडे बडे पण्डितों के पास भी नहीं थी, एक सच्चे कर्मयोगी थे, स्वयं अशिक्षित होकर अपने लोगों से कहते थे अपने बच्चों को हर हालत में पढाना लिखाना, इसके लिए जरुरत पडे तो घर के टूटे-फूटे बर्तन भी बेच देना, मिट्टी के पात्र में या हाथ में रोटी लेकर खा लेना, चाहे एक समय भूखा रहना पड़े या फिर कपडा कम पहनो, लेकिन बच्चों को पढाने लिखाने का काम अवश्य करो।
इस अवसर पर अमृतलाल सतविजवा, मनोज देवतवाल, राजेंद्र मालिया, आकाश सोलंकी, और कपिल सोलंकी ने अपने विचार प्रस्तुत किए और आयोजन की सराहना की। कार्यक्रम का संचालन कैलाश गोंड ने तथा चंद्रकांत मोहाडकर ने सफल आयोजन के लिए सभी का आभार व्यक्त किया।