बड़वानी। दीपावली नजदीक आते ही बाजारों में रंग-बिरंगे और डिजाइनर दीपकों की सजावट दिखाई देने लगी है। कहीं आर्टिफिशियल दीये ग्राहकों को आकर्षित कर रहे हैं तो कहीं गुजरात से आए आकर्षक डिजाइन वाले दीपकों की मांग बढ़ रही है। बाजार में दीपकों की इस चमक के बीच मिट्टी को आकार देकर पारंपरिक दीये बनाने वाले स्थानीय माटी शिल्पकारों की मेहनत और संघर्ष कहीं पीछे छूटता नजर आ रहा है। हालात यह हैं कि लागत लगातार बढ़ने के बावजूद हाथ से बनाए गए मिट्टी के दीपक महज 20 रुपये दर्जन बिक रहे हैं, जबकि रेडीमेड दीपक करीब 40 रुपये दर्जन में उपलब्ध हैं।
पीढ़ियों से जुड़ा है मिट्टी के दीपक बनाने का काम
बड़वानी के धोबड़या तालाब क्षेत्र में रहने वाले सात-आठ परिवार पीढ़ियों से मिट्टी के दीपक बनाने के पारंपरिक व्यवसाय से जुड़े हैं। दीपावली के लिए इन परिवारों की तैयारियां गणेश चतुर्थी से ही शुरू हो जाती हैं। परिवार के बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग सभी मिलकर दीपक बनाने में जुटते हैं। प्रत्येक परिवार करीब दो से तीन हजार दीपक तैयार करता है।
इसके बावजूद बाजार में रेडीमेड और आकर्षक डिजाइन वाले दीपकों की बढ़ती मांग के कारण स्थानीय कारीगरों को अपनी मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है।
मिट्टी से लेकर बिजली तक का खर्च बढ़ा
दीपक निर्माण से जुड़े गौरव गोले बताते हैं कि पहले मिट्टी आसानी से और कम कीमत पर मिल जाती थी, लेकिन अब एक ट्रॉली मिट्टी खरीदने के लिए करीब तीन हजार रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। पहले हाथ के चाक से दीपक बनाए जाते थे, लेकिन अब इलेक्ट्रॉनिक चाक का उपयोग करना पड़ता है। इससे मेहनत कुछ कम हुई है, लेकिन बिजली का खर्च बढ़ गया है।
कारीगर दुर्गा गोले के अनुसार, पहले बिजली का बिल 200 से 500 रुपये तक आता था, जो अब बढ़कर 1,500 से 2,000 रुपये तक पहुंच गया है। कच्चे माल और उत्पादन की लागत बढ़ने के बावजूद बाजार में दीपकों की कीमत नहीं बढ़ पा रही है।
कई चरणों से गुजरकर तैयार होता है एक दीपक
मिट्टी का दीपक तैयार करने में कई दिनों की मेहनत लगती है। सबसे पहले मिट्टी को छानकर पानी में भिगोया जाता है। इसके बाद उसे सुखाकर अच्छी तरह गूंथा जाता है और उसमें से छोटे-छोटे कंकड़-पत्थर निकाले जाते हैं। तैयार मिट्टी को इलेक्ट्रॉनिक चाक पर आकार देकर दीपक बनाए जाते हैं। इसके बाद उन्हें सुखाया जाता है और आग में पकाने के बाद बिक्री के लिए तैयार किया जाता है।
स्थानीय कारीगरों की मदद से बच सकती है परंपरा
कारीगरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती उत्पादन लागत और बाजार में उचित कीमत नहीं मिलना है। रेडीमेड उत्पादों की प्रतिस्पर्धा के बीच पारंपरिक मिट्टी के दीपकों की मांग सीमित होती जा रही है। ऐसे में दीपावली पर स्थानीय कारीगरों के बनाए दीपक खरीदना उनके पारंपरिक हुनर और आजीविका को सहारा देने का माध्यम भी बन सकता है।
यदि लोग स्थानीय माटी शिल्पकारों के दीपकों को प्राथमिकता दें और उन्हें मेहनत के अनुरूप उचित कीमत मिले, तो न केवल इन परिवारों को आर्थिक संबल मिलेगा, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही यह पारंपरिक कला भी आने वाली पीढ़ियों तक जीवित रह सकेगी।