नीमच। क्या भारत आज भी बाबा आदम के ज़माने में जी रहा है? नीमच तहसील का रातड़िया गांव, खासकर उसका बावरी मोहल्ला, इस सवाल का सबसे भयावह जवाब है! यहां के लोग नारकीय जीवन जीने को अभिशप्त हैं, जहां हर कदम मौत से कम नहीं है और हर सांस गंदगी के ज़हर से सनी है। सोचिए, जहां बच्चे स्कूल जाने के लिए कीचड़ के दलदल से होकर गुजरते हैं, बुजुर्गों का घर से निकलना भी किसी कुश्ती लड़ने से कम नहीं। पूरा मोहल्ला कीचड़ में इस कदर धंसा है कि यहां पैदल चलना या वाहन चलाना, किसी दुःस्वप्न से कम नहीं। बदबू और गंदगी का ऐसा अंबार है कि हर पल दम घुटने का एहसास होता है। क्या यही है विकसित भारत की तस्वीर?
ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने कई बार हाथ जोड़े, गिड़गिड़ाए, लेकिन सरपंच और सचिव ने उनकी एक न सुनी। उल्टा उन्हें मुंह पर कह दिया गया, जो करना है कर लो, रोड नहीं बनेगा! यह केवल एक बयान नहीं, यह उन असहाय लोगों के सपनों पर मारा गया सबसे क्रूर थप्पड़ है, जो बस एक अदद सड़क मांग रहे हैं। क्या सरकारी नुमाइंदे इतने बहरे हो गए हैं कि उन्हें इन चीखती आवाज़ों का दर्द सुनाई नहीं देता?अब ग्रामीणों का सब्र टूट गया है। उन्होंने साफ़ कह दिया है, ष्अगर हमारी समस्या का समाधान नहीं हुआ, तो इस बार चुनाव में एक भी वोट नहीं देंगे! क्या प्रशासन और विधायक को इस खुली चेतावनी के मायने समझ में आते हैं? क्या उन्हें नहीं लगता कि अब बहुत हो चुका? बच्चे, बूढ़े, जवान, सब अपनी जेब से पैसा लगाकर गड्ढे भर रहे हैं, ताकि किसी तरह आने-जाने का रास्ता बन सके। सवाल ये है क्या कोई है, जो रातड़िया के बावरी मोहल्ले की इस चीखती-चिल्लाती हकीकत पर ध्यान देगा? या ये लोग यूं ही नरक में जीने को अभिशप्त रहेंगे?