नई दिल्ली/भोपाल। राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र निरस्त किए जाने के खिलाफ दायर याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान न्यायालय आमतौर पर हस्तक्षेप नहीं करता और ऐसे विवादों का समाधान चुनाव संपन्न होने के बाद चुनाव याचिका के माध्यम से किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 329(बी) के तहत चुनाव संबंधी मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप पर रोक है। अदालत ने यह तर्क भी अस्वीकार कर दिया कि नामांकन निरस्तीकरण यदि मनमाना या गलत हो तो तत्काल सुनवाई की जाए। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करने से प्रत्येक चुनावी विवाद में अलग-अलग जांच करनी पड़ेगी, जो संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं होगा।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 32 के तहत इस मामले में सुनवाई संभव नहीं है। हालांकि, याचिकाकर्ता को चुनाव याचिका दायर करने का अधिकार सुरक्षित रहेगा।
सुनवाई के दौरान कांग्रेस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि मीनाक्षी नटराजन को चुनाव लड़ने का अवसर दिया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि यदि उन्हें पर्याप्त वोट नहीं मिलते तो वह चुनाव हार जातीं, लेकिन नामांकन स्तर पर ही बाहर कर देना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विपरीत है।
उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश की तीसरी राज्यसभा सीट के लिए कांग्रेस ने मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाया था। भाजपा की ओर से उनके नामांकन पर आपत्ति दर्ज कराई गई थी। आरोप था कि उन्होंने अपने खिलाफ लंबित एक मामले की जानकारी नामांकन पत्र में उल्लेखित नहीं की। रिटर्निंग अधिकारी अरविंद शर्मा ने आपत्ति स्वीकार करते हुए 9 जून को उनका नामांकन निरस्त कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मीनाक्षी नटराजन ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि लोकतंत्र में पहले वोट चोरी होने की बातें होती थीं, लेकिन इस बार एक पूरी सीट ही छीन ली गई। उन्होंने कहा कि कांग्रेस इस मुद्दे पर लोकतांत्रिक और कानूनी लड़ाई आगे भी जारी रखेगी।
गौरतलब है कि नामांकन निरस्त होने के बाद मध्य प्रदेश की तीनों राज्यसभा सीटों पर भाजपा उम्मीदवार रजनीश अग्रवाल, तरुण चुग और महेश केवट निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए जा चुके हैं।