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June 12, 2026, 2:18 pm
KHABAR : टीईटी अनिवार्यता के खिलाफ शिक्षकों का मोर्चा, 18 जून को प्रदेशभर में सौंपेंगे ज्ञापन, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बढ़ी चिंता, पढे़ खबर 

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भोपाल। मध्यप्रदेश शिक्षक संघ ने कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य किए जाने के मुद्दे पर मोर्चा खोल दिया है। संघ ने साफ कहा है कि 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों पर बाद में बने नियम लागू करना न केवल अव्यवहारिक है, बल्कि यह प्राकृतिक न्याय और कानूनी निश्चितता के सिद्धांतों के भी विपरीत है।


संघ के प्रदेशाध्यक्ष डॉ. क्षत्रवीर सिंह राठौर और प्रदेश महामंत्री राकेश गुप्ता ने बताया कि 29 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद प्रदेश सहित देशभर के लाखों शिक्षकों में असमंजस की स्थिति बन गई है। इस फैसले के अनुसार, कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए टीईटी उत्तीर्ण करना आवश्यक माना गया है।


इसी के विरोध में शिक्षक संघ ने 18 जून 2026 को प्रदेश के सभी जिलों में कलेक्टर के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के नाम ज्ञापन सौंपने का निर्णय लिया है।


15-20 साल से कार्यरत शिक्षकों पर संकट
संघ के अनुसार, 23 अगस्त 2010 को एनसीटीई द्वारा टीईटी को न्यूनतम अर्हता घोषित किया गया था। इसके पहले विभिन्न राज्यों में लाखों शिक्षकों की नियुक्ति उस समय लागू नियमों और चयन प्रक्रियाओं के तहत हुई थी। ये शिक्षक पिछले 15 से 20 सालों से शिक्षा, सामाजिक चेतना और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।


ऐसे में अब नए मानदंडों को पूर्व प्रभाव से लागू करना उनके सेवाकाल और भविष्य दोनों पर प्रतिकूल असर डाल सकता है।


संसद से समाधान की मांग
शिक्षक संघ ने केंद्र सरकार से मांग की है कि वर्ष 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों की सेवाओं को वैध मानते हुए मानसून सत्र में आवश्यक विधायी संशोधन किया जाए। साथ ही 23 अगस्त 2010 की अधिसूचना में संशोधन कर सुप्रीम कोर्ट को भी अवगत कराया जाए, ताकि लाखों शिक्षकों का भविष्य सुरक्षित किया जा सके।


संघ ने कहा कि न्यायालय के निर्णय का सम्मान करते हुए भी व्यापक जनहित में नीति-निर्माण का अधिकार विधायिका के पास है और सरकार को इस दिशा में जल्द कदम उठाना चाहिए।


प्रदेश ही नहीं, देशभर के 20 लाख शिक्षक प्रभावित
संघ का दावा है कि इस निर्णय से मध्यप्रदेश के करीब डेढ़ लाख और देशभर के 20 लाख से अधिक शिक्षक प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे में यह केवल एक राज्य का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बन चुका है।

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