चित्तौड़गढ़। स्थानीय गांधीनगर स्थित समता भवन में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए महासती पूर्वीश्री ने कहा कि व्यक्ति पर्यटन और मनोरंजन के लिए बाहर सुख तलाशता है, लेकिन सच्चा आनंद उसे अपने घर लौटकर ही मिलता है। इसी प्रकार संसार में बाहरी सुख-सुविधाओं और भौतिक साधनों में सुख तलाशने के बजाय व्यक्ति को अपने भीतर झांकना चाहिए। वास्तविक सुख स्वयं के भीतर ही विद्यमान है, जिसकी अनुभूति के लिए आत्मचिंतन और अनुप्रेक्षा आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि ‘नमो आयरियाणम्’ अर्थात आचार्य को नमन। आचार्य संघ के कुशल संचालक होते हैं। इसी प्रकार परिवार के प्रत्येक सदस्य को भी अपनी जिम्मेदारियों और कर्तव्यों का कुशलतापूर्वक निर्वहन करना चाहिए। केवल परिवार के मुखिया की ही जिम्मेदारी नहीं होती, बल्कि सभी सदस्यों को सेवा और कर्तव्य भावना के साथ अपनी जिम्मेदारियां निभानी चाहिए। जब व्यक्ति दूसरों से अपेक्षा रखना छोड़ देता है, तो परिवार में शांत और प्रशांत वातावरण बना रहता है।
महासती पूर्वीश्री ने कहा कि सभी से विनम्रता और प्रेमपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपने तरीके से जीवन जीने का अधिकार है। अनावश्यक दखलअंदाजी ही कई बार कलह और अशांति का कारण बनती है। इसलिए किसी की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करने के बजाय स्वयं में सुधार लाने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति की परिस्थितियां और अनुकूलता अलग-अलग होती हैं। जो व्यक्ति किसी अवसर पर धर्मस्थल नहीं पहुंच पाता, उसके प्रति यह भावना नहीं रखनी चाहिए कि वह धर्म में रुचि नहीं रखता। जब भी अवसर मिले, धर्म का लाभ लेना चाहिए। प्रेम, सहानुभूति और आत्मीयता के व्यवहार से ही सामने वाले व्यक्ति को धर्म के मार्ग पर प्रेरित किया जा सकता है।
महासती ने कहा कि धार्मिक व्यक्ति को एकांत में आत्मचिंतन करते हुए स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि क्या वह वास्तव में प्रसन्न है। अपने भीतर झांककर विचार करने और स्वयं को समझने की आवश्यकता है। शिकायत करने के बजाय समस्याओं का समाधान शांतिपूर्वक तलाशना चाहिए। परिवार में मधुरता बनाए रखने के साथ सभी के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना चाहिए। स्वयं के प्रति जिम्मेदारी भी धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में प्रसन्नता के साथ आगे बढ़ने की है।
धर्म सरल और शांत हृदय में ठहरता है-
धर्मसभा को संबोधित करते हुए महासती सुश्रिया ने कहा कि धर्म शांत और सरल हृदय में ही ठहरता है। हमारा व्यवहार ऐसा होना चाहिए, जिससे किसी भी जीव को पीड़ा न पहुंचे। उन्होंने मार्मिक उदाहरणों के माध्यम से उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
इस अवसर पर मदनलाल श्रीमाल की पुत्रवधू सुमन श्रीमाल पत्नी मोहित श्रीमाल द्वारा की गई आठ उपवास की तपस्या पर उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने ‘हर्ष-हर्ष, जय-जय’ के उद्घोष के साथ तप की अनुमोदना की। महासती पूर्वीश्री ने तपस्या के लिए मन को मजबूत बनाने का आह्वान किया।
तपस्वी सुमन श्रीमाल ने अपनी तपस्या के लिए आचार्य रामेश, उपाध्याय प्रवर राजेश मुनि की कृपा तथा अत्र विराजित महासतीवर्या से प्राप्त तप प्रेरणा के प्रति आभार व्यक्त करते हुए अपने भाव प्रकट किए।
धर्मसभा के दौरान एकासन, उपवास, आयंबिल, तेला आदि के प्रत्याख्यान हुए। अंत में महासती ने मंगल पाठ सुनाया। कार्यक्रम का संचालन शंकर सुराणा ने किया।