रतलाम। आधुनिक दौर में जहां मोबाइल, टीवी और सोशल मीडिया मनोरंजन के प्रमुख साधन बन चुके हैं, वहीं रतलाम जिले का सरसी गांव आज भी अपनी अनूठी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा को संजोए हुए है। यहां पिछले 66 वर्षों से रामलीला का मंचन लगातार किया जा रहा है। खास बात यह है कि राम से लेकर रावण तक सभी पात्र गांव के ही युवा निभाते हैं। इतना ही नहीं, रामलीला के प्रति ग्रामीणों की आस्था ऐसी है कि गांव के एक मोहल्ले का नाम ही श्लंका पड़ गया है।
1960 से चली आ रही रामलीला की परंपरा
ग्राम सरसी में श्री विजय रामलीला मंडल द्वारा वर्ष 1960 से रामलीला का मंचन किया जा रहा है। हर वर्ष नवरात्रि के दौरान दस दिनों तक भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े विभिन्न प्रसंगों की प्रस्तुतियां दी जाती हैं। राम जन्म से शुरू होने वाली लीला में सीता हरण, हनुमान मिलन, लक्ष्मण मूर्छा, संजीवनी बूटी और रावण वध जैसे प्रसंगों का जीवंत मंचन होता है। दशहरे के दिन रावण वध के साथ रामलीला का भव्य समापन किया जाता है।
इस आयोजन को देखने के लिए सरसी सहित आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
दिन में किसान, रात में बनते हैं राम-लक्ष्मण और रावण
इस रामलीला की सबसे बड़ी विशेषता इसके स्थानीय कलाकार हैं। भगवान राम, लक्ष्मण, माता सीता, रावण और मेघनाद सहित विभिन्न पात्रों की भूमिका गांव के युवा ही निभाते हैं। दिनभर खेत-खलिहानों और अपने कामकाज में व्यस्त रहने वाले ये युवा रात होते ही पारंपरिक वेशभूषा धारण कर रामलीला के मंच पर उतरते हैं।
कलाकारों की मेहनत और समर्पण ने इस परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखा है।
प्रदेश के कई शहरों में पहचान बना चुकी है मंडली
श्री विजय रामलीला मंडल की प्रस्तुतियां अब सरसी गांव तक सीमित नहीं हैं। मंडली विदिशा, सीहोर, इंदौर, आष्टा, भोपाल और हरसोला सहित मध्यप्रदेश के विभिन्न स्थानों पर रामलीला का मंचन कर चुकी है। स्थानीय कलाकारों की प्रतिभा और वर्षों की साधना ने इस मंडली को प्रदेश स्तर पर पहचान दिलाई है।
गांव में लंका नाम का मोहल्ला, इसी पते पर आती है डाक!
सरसी गांव की एक और दिलचस्प पहचान यहां का श्लंकाश् मोहल्ला है। ग्रामीणों के अनुसार, इस मोहल्ले का नाम लंका इतना प्रचलित हो चुका है कि यहां रहने वाले लोगों की डाक और पार्सल भी इसी पते पर पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों के आधार कार्ड पर भी लंका, ग्राम सरसी का पता दर्ज होने की बात बताई जाती है।
सरसी की यह परंपरा बताती है कि बदलते दौर में भी लोककला, आस्था और संस्कृति को जीवित रखने का संकल्प हो, तो गांव के युवा ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन सकते हैं।