बड़वानी। नवरात्रि में मां दुर्गा की भक्ति के रंग हर ओर दिखाई दे रहे हैं, लेकिन बड़वानी में दुर्गा पूजा का एक ऐसा रंग भी देखने को मिल रहा है, जो आपसी प्रेम, भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश दे रहा है। यहां स्वर संगम गरबा महोत्सव में मुस्लिम युवा पिछले 25 वर्षों से गायन और वादन के माध्यम से अपनी संगीत सेवा दे रहे हैं। इतना ही नहीं, मुस्लिम युवा सादिक पटेल और उनके साथियों ने मां दुर्गा के मंदिर की आकर्षक सजावट भी तैयार की है।
1984 से जारी है स्वर संगम गरबा महोत्सव की परंपरा
स्वर संगम गरबा महोत्सव की शुरुआत वर्ष 1984 में रणजीत चौक से हुई थी। बड़वानी में रणजीत चौक पर स्वर संगम और झंडा चौक पर श्रीराम गरबा के पारंपरिक आयोजन वर्षों से श्रद्धा और उत्साह के साथ होते आ रहे हैं।
स्वर संगम के संस्थापक सदस्य गुरमीत सिंह गांधी और सुरेश पटेल ने बताया कि सईद खान पठान भी स्वर संगम के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे हैं और उन्होंने वर्षों तक गरबा आयोजन की जिम्मेदारी संभाली। बोहरा समाज के स्वर्गीय मुस्तन सिर आसिफ बाबूजी ने दस वर्षों तक गरबा नृत्य का निर्देशन किया, वहीं गायक असगर अली नसीम ने लंबे समय तक मंडल के साथ जुड़कर गरबा गायन किया।
25 वर्षों से मुस्लिम संगीतकार दे रहे सेवा
मंडल अध्यक्ष जितेंद्र जैन ने बताया कि अंजड़ के मुस्लिम संगीतकार पिछले 25 वर्षों से स्वर संगम में गरबा गायन और वादन में सक्रिय हैं। ये कलाकार माता के पूजन और धार्मिक विधि-विधान में भी पूरी भागीदारी निभाते हैं। आयोजन में हिंदू-मुस्लिम साझा संस्कृति और आपसी सद्भाव की सुंदर झलक देखने को मिलती है।
कार्यकारी अध्यक्ष सचिन शर्मा ने बताया कि हर वर्ष माता रानी का मंदिर अस्थायी रूप से तैयार किया जाता है। पिछले पांच वर्षों से सादिक पटेल पेंटर और उनके साथी मंदिर की आकर्षक डिजाइन और सजावट तैयार कर रहे हैं। इस वर्ष भी उन्होंने महज 24 घंटे में माता मंदिर की मनमोहक झांकी तैयार की। खास बात यह है कि वे पांडाल में अपनी सेवाएं निःशुल्क प्रदान करते हैं।
नन्हे कलाकारों की प्रस्तुतियां जीत रहीं दर्शकों का दिल
स्वर संगम गरबा महोत्सव नए बाल कलाकारों को मंच देने के लिए भी जाना जाता है। इस वर्ष पांच नन्हे कलाकार तबले और ढोलक की थाप से दर्शकों का मन मोह रहे हैं। गुणकार सिंह गांधी, नयन जोशी, वर्धन अग्रवाल, सारांश सोनी और अनंत गोरे अपनी प्रस्तुतियों से आयोजन में चार चांद लगा रहे हैं।
वहीं, छोटे बाल कलाकार आशुतोष सोनी जब मधुर आवाज में श्सांवरिया सेठश् की तान छेड़ते हैं, तो दर्शक रोमांचित होकर माता रानी के जयकारे लगाने लगते हैं। गरबा नृत्य करने वाली बालिकाओं को जया जोशी और सागर कोठाना द्वारा प्रशिक्षण दिया गया है।
महाआरती के बाद देर रात तक चलता है गरबा
स्वर संगम गरबा महोत्सव के 43वें आयोजन के कार्यक्रम निर्देशक अनिल जोशी और एडवोकेट विनोद मुकाती ने बताया कि प्रतिदिन रात 9 बजे नगर के विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति में माता रानी की महाआरती होती है। इसके बाद रात 9रू40 बजे से गरबा प्रस्तुतियां शुरू होती हैं, जो रात 12रू30 बजे तक चलती हैं। अंत में पुनः आरती के साथ कार्यक्रम का समापन किया जाता है।
कार्यक्रम के दौरान छोटे बच्चों से हिंदू सनातन संस्कृति से जुड़े धार्मिक प्रश्न भी पूछे जाते हैं और सही उत्तर देने वाले बच्चों को अतिथियों द्वारा पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं। इसका उद्देश्य बच्चों को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ना है।
गरबा उत्सव के सचिव संजय मोरे ने नवरात्रि की शुभकामनाएं देते हुए सभी माता भक्तों से गरबा महोत्सव में शामिल होने की अपील की है।
बड़वानी का स्वर संगम गरबा महोत्सव साबित कर रहा है कि आस्था के रंग अलग हो सकते हैं, लेकिन संगीत, सेवा और सद्भाव सभी को एक सूत्र में बांधते हैं।