नीमच। मालवा-मेवाड के अफीम उत्पादक किसानों के लिए अक्टूबर का महीना बेहद अहम माना जाता है। खेत तैयार करने से लेकर बुवाई की शुरुआत तक किसानों को समय पर निर्णय लेने पड़ते हैं, लेकिन इस बार अफीम नीति की घोषणा में देरी ने उनकी चिंता बढ़ा दी है। तारीख पर तारीख बीत रही है, किसान खेतों की तैयारी और सरकारी आदेश के बीच उलझे हुए हैं, जबकि केंद्र सरकार की ओर से नीति को लेकर स्पष्ट घोषणा का इंतजार जारी है। 13 अक्टूबर तक नीति घोषित नहीं होने से किसानों के बीच बेचौनी बढ़ गई है। अब सवाल यह है कि आखिर अफीम नीति में देरी क्यों हो रही है? क्या किसानों की समस्याओं पर केंद्र सरकार का पर्याप्त ध्यान है? और यदि बुवाई में और विलंब हुआ, तो इसका फसल और उत्पादन पर कितना असर पड़ेगा?
नीति में देरी बढ़ा रही है किसानों की चिंता-
इन सवालों पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ पत्रकार मुस्तफा हुसैन ने अफीम नीति में देरी, सीपीएस व्यवस्था, पट्टों के नवीनीकरण और मृतक किसानों के पट्टे उनके वैध उत्तराधिकारियों के नाम हस्तांतरित करने जैसे मुद्दों पर अपनी बात रखी। उनका कहना है कि अफीम उत्पादक क्षेत्रों के किसानों के लिए यह फसल केवल खेती या आमदनी का साधन नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही परंपरा, मेहनत और सम्मान से भी जुड़ी हुई है। ऐसे में नीति में देरी किसानों की चिंता को और बढ़ा रही है।
नीति में देरी की आखिर क्या है वजह?
वरिष्ठ पत्रकार मुस्तफा हुसैन के अनुसार अफीम नीति में देरी के पीछे केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं और प्रशासनिक उदासीनता की भूमिका हो सकती है। उनका मानना है कि दिल्ली में चल रही राजनीतिक गतिविधियों और अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों के बीच अफीम उत्पादक किसानों की समस्या को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिल पा रही है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि देरी का कोई आधिकारिक कारण सामने आए बिना किसी एक वजह को निश्चित रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
पात्र किसानों के पट्टों से संबंधित प्रक्रिया को सरल बनाना चाहिए-
उन्होंने कहा कि अफीम नीति का इंतजार कर रहे किसानों के लिए समय बेहद महत्वपूर्ण है। सरकार को पहले से पता होता है कि पिछले वर्ष किन किसानों ने निर्धारित मापदंडों के अनुसार फसल की तुलाई करवाई और कौन किसान निर्धारित पात्रता पूरी करते हैं। ऐसे में पात्र किसानों के पट्टों से संबंधित प्रक्रिया को समयबद्ध और सरल बनाया जाना चाहिए, ताकि हर साल किसानों को अनिश्चितता का सामना न करना पड़े। किसानों की मांग केवल नीति जल्द जारी करने तक सीमित नहीं है। वे चाहते हैं कि सरकार ऐसी व्यवस्था बनाए, जिससे पात्र किसानों को हर वर्ष पट्टे के लिए लंबा इंतजार न करना पड़े और खेती की तैयारी समय पर हो सके।
बुवाई में देरी से उत्पादन पर असर की आशंका-
अफीम नीति में देरी से किसानों की चिंता बढ़ रही है। वरिष्ठ पत्रकार मुस्तफा हुसैन के अनुसार बुवाई का समय निकलने से पौधों के विकास, डोडों और अफीम उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार को समय पर नीति घोषित कर पात्र किसानों के पट्टों की प्रक्रिया सरल बनानी चाहिए, ताकि किसानों को हर साल इंतजार और अनिश्चितता का सामना न करना पड़े।
सीपीएस व्यवस्था की समीक्षा और किसानों की भागीदारी जरूरी-
वरिष्ठ पत्रकार मुस्तफा हुसैन ने सीपीएस व्यवस्था के तहत उत्पादित सामग्री के प्रसंस्करण को लेकर सवाल उठाए। उनका कहना है कि सरकार को उपलब्ध संसाधनों, भंडार और प्रसंस्करण क्षमता की समीक्षा कर व्यावहारिक निर्णय लेना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अफीम नीति बनाते समय किसानों, किसान संगठनों और खेती का अनुभव रखने वाले जनप्रतिनिधियों के सुझाव शामिल किए जाने चाहिए।
मृतक किसानों के पट्टे वारिसों के नाम करने की मांग-
अफीम उत्पादक किसानों की एक प्रमुख मांग मृतक किसान के पट्टे को उसके वैध उत्तराधिकारी के नाम हस्तांतरित करने की प्रक्रिया सरल बनाना है। वरिष्ठ पत्रकार मुस्तफा हुसैन के अनुसार ऐसे मामलों का समयबद्ध निस्तारण होना चाहिए, ताकि परिवारों को अनावश्यक परेशानी न हो। उन्होंने कहा कि अफीम की खेती मालवा-मेवाड़ में परंपरा और आजीविका से जुड़ी है, इसलिए केंद्र सरकार को किसानों की समस्याओं पर प्राथमिकता से निर्णय लेना चाहिए।