भोपाल। मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग यानि OBC के 27 प्रतिशत आरक्षण को लेकर उपजे कानूनी और सियासी घमासान के बीच अब सियासत में नए समीकरण आकार ले रहे हैं। हाई कोर्ट के हालिया फैसलों और तर्कों के बाद अब राज्य के राजनीतिक गलियारों में एक नए 50-50 फॉर्मूले की चर्चा जोरों पर है। सूत्रों के हवाले से मिल रही जानकारी के मुताबिक इस पेचीदगियों से निपटने के लिए अब सरकार के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी संगठन स्तर पर भी बड़े कदम उठाने की तैयारी की जा रही है।
क्या है बीजेपी और सरकार का 50-50 फॉर्मूला?
सूत्रों का कहना है कि इस संवेदनशील मामले में अब सिर्फ प्रशासनिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि राजनीतिक और कानूनी मोर्चे पर समानांतर रणनीति पर काम होगा। योजना के तहत इस मामले में अब सीधे तौर पर सरकार के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी भी सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट में लीव टू अपील: कानूनी प्रक्रिया के तहत इस केस में हस्तक्षेप करने और मजबूती से पक्ष रखने के लिए लीव टू अपील का रास्ता अपनाया जाएगा। साथ ही अब तक के मुकदमों और केस में लगाए गए सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज भी पार्टी स्तर पर समन्वय के लिए साझा किए जाने की योजना है।
विधानसभा में नया कानून या अध्यादेश: यदि सुप्रीम कोर्ट से तत्काल राहत मिलने में कोई अड़चन आती है तो राज्य सरकार विधानसभा के जरिए नया कानून लाने या नया अध्यादेश लाने का विकल्प भी खुला रख रही है। 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को कानूनी जामा पहनाने के लिए यह विकल्प सबसे अहम माना जा रहा है।
कहा जा रहा है कि इस पूरे फॉर्मूले पर गंभीर मंथन जारी है। हाल ही में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के दिल्ली दौरे के दौरान भी केंद्रीय नेतृत्व और वरिष्ठ स्तर पर इस पर पहले दौर की चर्चा हो चुकी है। पार्टी हाईकमान की हरी झंडी मिलने के बाद इस पर औपचारिक मुहर लग सकती है।
राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा के तीखे सवाल
एक तरफ जहां भाजपा और सरकार अपने नए कानूनी विकल्पों पर विचार कर रही है, वहीं दूसरी तरफ इस मुद्दे पर कांग्रेस ने आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने सोशल मीडिया और बयानों के जरिए सरकार की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल खड़े किए हैं।
विवेक तन्खा ने अपने ट्वीट और बयानों में दो टूक कहा है कि किसी भी अध्यादेश या आरक्षण के कानून को अदालत में डिफेंड करना सीधे तौर पर सरकार का ही संवैधानिक दायित्व है। उन्होंने सवाल उठाया कि मध्य प्रदेश सरकार का इस कानूनी मामले से दूरी बनाए रखने का निर्णय पूरी तरह समझ से बाहर है, क्योंकि इस पूरे प्रकरण में राज्य सरकार मुख्य पक्षकार है। तन्खा ने तंज कसते हुए कहा कि हाईकोर्ट में बहस मूल रूप से सरकार द्वारा की जानी थी न कि किसी राजनीतिक दल के जरिए और आरक्षण के कानून को केवल सरकार ही प्रभावी तरीके से बचा सकती है।