नीमच। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत पिछले 10 वर्षों में विभिन्न आयोजनों और जुलूसों को दी गई अनुमति से संबंधित रिकॉर्ड मांगने पर पुलिस प्रशासन द्वारा जानकारी देने में असमर्थता जताने का मामला सामने आया है। मामला नीमच जिले के जावद थाना क्षेत्र और नयागांव चौकी से जुड़ा है। इस मामले में सूचना का अधिकार कार्यकर्ता हारून रशीद कुरैशी ने प्रथम अपील प्रस्तुत कर सूचना रोकने के आधारों पर सवाल उठाए हैं।
कुरैशी ने RTI आवेदन के माध्यम से नयागांव चौकी क्षेत्र में जुलूसों के संबंध में जारी अनुमति और पुलिस अनुशंसा की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं। इसके साथ ही पिछले 10 वर्षों के दौरान विभिन्न समाजों और आयोजकों को जुलूस एवं धार्मिक आयोजनों के लिए दी गई अनुमतियों से संबंधित रिकॉर्ड भी मांगा गया था।
आवेदन के संबंध में जावद थाना प्रभारी एवं सहायक लोक सूचना अधिकारी की ओर से अनुविभागीय अधिकारी पुलिस (SDOP), जावद को रिपोर्ट भेजी गई। इसमें मांगी गई कुछ सूचनाएं उपलब्ध कराने में असमर्थता जताते हुए सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(j) और धारा 11 का हवाला दिया गया। पुलिस की ओर से निजता और तृतीय पक्ष से संबंधित सूचना के प्रावधानों को आधार बनाया गया है।
प्रथम अपील में सुरक्षा संबंधी आधार पर उठाए सवाल
प्रथम अपील में हारून रशीद कुरैशी ने तर्क दिया कि यदि सूचना के प्रकटीकरण से किसी व्यक्ति के जीवन या शारीरिक सुरक्षा को खतरा होने की आशंका है, तो संबंधित अधिकारी को स्पष्ट करना चाहिए कि किस व्यक्ति को खतरा है और जानकारी सार्वजनिक करने से यह खतरा किस प्रकार उत्पन्न हो सकता है। उनका कहना है कि केवल सामान्य या अस्पष्ट आशंका के आधार पर सूचना देने से इनकार करना उचित नहीं है।
कुरैशी ने यह भी कहा कि मांगी गई जानकारी मुख्य रूप से प्रशासनिक अनुमति प्रक्रिया, पुलिस की अनुशंसा और आधिकारिक रिकॉर्ड से संबंधित है। ऐसे में प्रत्येक सूचना के संबंध में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि उसे किस वैधानिक प्रावधान के तहत रोका जा रहा है।
संवेदनशील अंश हटाकर शेष रिकॉर्ड देने की मांग
अपील में कुरैशी ने यह मुद्दा भी उठाया कि यदि किसी दस्तावेज में वास्तव में किसी व्यक्ति की निजी या संवेदनशील जानकारी शामिल है, तो उस हिस्से को अलग करके शेष उपलब्ध रिकॉर्ड प्रदान करने पर विचार किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, पूरे दस्तावेज को रोकने के बजाय अभिलेखों की जांच कर कानून के अनुरूप उपलब्ध कराई जा सकने वाली जानकारी दी जानी चाहिए।
उन्होंने धारा 8(1)(j) और धारा 11 के इस्तेमाल पर आपत्ति जताते हुए कहा कि जुलूसों की अनुमति से संबंधित प्रशासनिक निर्णयों और आधिकारिक अभिलेखों की प्रकृति को ध्यान में रखकर सूचना के प्रत्येक बिंदु पर अलग-अलग विचार किया जाना चाहिए।
अब प्रथम अपीलीय अधिकारी के फैसले पर नजर
यह मामला सरकारी रिकॉर्ड तक नागरिकों की पहुंच, प्रशासनिक पारदर्शिता और निजता के कानूनी संरक्षण के बीच संतुलन से जुड़ा है। सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत कुछ परिस्थितियों में व्यक्तिगत जानकारी रोकी जा सकती है, वहीं अधिनियम की धारा 10 के अनुसार, किसी रिकॉर्ड के केवल कुछ हिस्से पर छूट लागू होने की स्थिति में शेष हिस्से को अलग करके उपलब्ध कराने पर विचार किया जा सकता है।
अब प्रथम अपीलीय अधिकारी के निर्णय से यह स्पष्ट होगा कि मांगी गई जानकारी में से किन अभिलेखों को उपलब्ध कराया जा सकता है और किन हिस्सों पर वैधानिक छूट लागू होती है। फिलहाल, इस मामले में प्रथम अपील के निर्णय का इंतजार है।