रामपुरा। जैसा कि विदित है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट का निर्देश है कि मठ-मंदिर की भूमि नीलाम नहीं कि जाए तथा खाद-बीज, क्रेडिट कार्ड, फसल बीमा व कलेक्टर का नाम हटाकर पुजारी का नाम चढ़ाया जाए।
न्यायालय ने अपने निर्णय दिनांक 6 सितंबर 2021 के पैरा 13 में स्पस्ट रूप से उल्लेखित किया है कि मूर्ति एवँ मंदिर से जुड़ी सम्पत्ति को नीलाम करने का अधिकार शासन को नहीं है। न्यायालय ने भी ये माना है कि मूर्ति से जुड़ी सम्पत्ति मूर्ति की ही है। बावजूद इसके नगर रामपुरा में तहसीलदार द्वारा क्षेत्र के पुजारियों को 10 एकड़ से अधिक की भूमि नीलामी के नोटिस थमा दिए गए हैं। जो कि सरासर गलत है। धर्मस्थ विभाग के आदेश की अनुपालना का हवाला देते हुए तहसीलदार ने नगर में पुजारियों को नोटिस देने के बाद से ही मठ-मंदिर के पुजारियों में शासन के खिलाफ रोष देखा जा रहा है। हाल ही में भगवान श्री परशुराम जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह द्वारा स्वयं मठ-मंदिरों को सरकारी हस्तक्षेप से पूर्णतः समाप्त करने की घोषणा की गई थी, बावजूद इसके प्रशासन ऐसा कदम क्यो उठा रहा है। और विचारणीय प्रश्न ये है कि ये सारी प्रक्रिया सर्वप्रथम रामपुरा नगर से ही प्रारम्भ क्यो की गई ?
पुजारियों ने बताया कि चुनावी वर्ष में एक ओर जहां सरकारें लोक लुभावन वादे एवँ घोषणाएं करके आम जन को अपनी ओर आकर्षित करती है ऐसे में प्रदेश के हजारों पुजारियों के ऊपर ये आर्थिक मार क्यों ? उन्हें अपने खिलाफ क्यों कर रही है सरकार ? प्रदेश के वित्तमंत्री जगदीश देवड़ा के नगर आगमन पर मठ-मंदिर पुजारी संघ ने आज उन्हें ज्ञापन सौंपकर मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना सरकार द्वारा की जा रही है, जो न्यायसंगत नही है। इस प्रकार की नीलामी प्रक्रिया को तुरंत रोका जाकर पुजारियों के साथ न्यायोचित व्यवहार किया जाए अन्यथा नगर सहित प्रदेशभर के पुजारियों द्वारा उग्र आंदोलन किया जाएगा, जिसकी जिम्मेदारी शासन की होगी।