नीमच। संसार में जीवन यापन करने के लिए मनुष्य कर्म करता है। अपमान जनक शब्दों के उपयोग तथा विपरीत परिस्थिति आने पर मनुष्य क्रोध में आ जाता है और सहनशीलता छोड़ देता है। विपरीत परिस्थितियों में व्यक्ति को धैर्य पूर्वक सहनशीलता रखना चाहिए। सहनशील व्यक्ति ही जीवन में कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सरलता से आगे बढ़ सकता है।
यह बातश्री जैन श्वेतांबर भीड़भंजन पार्श्वनाथ मंदिर ट्रस्ट श्री संघ नीमच के तत्वावधान में बंधू बेलडी पूज्य आचार्य श्री जिनचंद्र सागरजी मसा के शिष्य रत्न नूतन आचार्य श्री प्रसन्नचंद्र सागरजी मसा ने कही। वे चातुर्मास के उपलक्ष्य में मिडिल स्कूल मैदान के समीप जैन भवन में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि मनुष्य हर कर्म करने के बाद सम्मान की आशा करता है।कि व्यक्ति को हर पुण्य कर्म करने के बाद फल की इच्छा नहीं करनी चाहिए। हर व्यक्ति की अपेक्षाएं ज्यादा होती है। जब अपेक्षाओं का सम्मान नहीं होता है तो व्यक्ति क्रोध में आ जाता है। व्यक्ति को जीवन में सफल होना है तो क्रोध और लालच का त्याग करना चाहिए तभी उसके जीवन का कल्याण हो सकता है।छोटे से लाभ के लिए व्यापार में झूठ बोल देता है कि व्यापार सच बोलकर करना चाहिए ।झूठ नहीं बोलना चाहिए।मोह माया को छोड़े तो उसके जीवन का कल्याण हो सकता है। मनुष्य जन्म दुर्लभ है। अनादि काल से मनुष्य जन्म मरण के चक्कर में उलझा है।इस जन्म के कर्म ही पूरे याद नहीं रहते हैं तो अगले जन्म का कैसे याद रखेगा। सांसारिक मोह माया में उलझ कर मनुष्य संसार में भटकता रहता है। 4गति में नहीं जाना समयक चिन्ह है।आत्मा के कल्याण के लिए मनुष्य को रात्रि भोज का त्याग करना चाहिए। स्त्री के मन को ब्रह्मा जी भी नहीं जा पाए हैं।
श्री संघ अध्यक्ष अनिल नागौरी ने बताया कि धर्मसभा में तपस्वी मुनिराज श्री पावनचंद्र सागरजी मसा एवं पूज्य साध्वीजी श्री चंद्रकला श्रीजी मसा की शिष्या श्री भद्रपूर्णा श्रीजी मसा आदि ठाणा 4 का भी चातुर्मासिक सानिध्य मिला।पूज्य आचार्य भगवंत का आचार्य पदवी के बाद प्रथम चातुर्मास नीमच में हो रहा है। उपवास, एकासना, बियासना, आयम्बिल, तेला, आदि तपस्या के ठाठ लग रहे है। धर्मसभा में जावद ,जीरन, मनासा, नयागांव, जमुनिया,जावी, आदि क्षेत्रों से श्रद्धालु भक्त सहभागी बने।धर्मसभा का संचालन सचिव मनीष कोठारी ने किया।