चित्तौड़गढ़। स्थानीय गांधीनगर स्थित समता भवन में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए महासती पूर्वीश्री ने कहा कि संसार के रिश्ते स्वार्थ से भरे हुए हैं। संसार में संयोगों में जितना सुख माना जाता है, उतना ही दुख वियोग में भी होता है। सत्य को समझने की आवश्यकता है कि संसार में कोई भी संबंध स्थायी नहीं है। व्यक्ति को अनासक्त भाव से संसार में रहते हुए अपने दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए और प्रत्येक कर्तव्य सेवा भावना के साथ पूरा करना चाहिए।
महासती ने कहा कि मोह के कारण व्यक्ति संसार में उलझा रहता है। इसलिए मोह को दूर कर अनासक्ति के भाव अपनाने चाहिए। जीवन और आयुष्य का कोई निश्चित भरोसा नहीं है, इसलिए साधना, आराधना, धर्म और ध्यान को प्राथमिकता देनी चाहिए। काल्पनिक दुनिया में जीने वाला व्यक्ति दुख का अनुभव करता है। वास्तविकता यही है कि मनुष्य अकेला आता है और अकेला ही जाता है। जीवन का उद्देश्य जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाना, संयमपूर्वक जीवन जीना और मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ना होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि छोटी-सी बीमारी आने पर भी व्यक्ति भयभीत हो जाता है और जीवन बचाने के लिए अनेक प्रयास करता है, लेकिन जब आयुष्य पूर्ण हो जाता है, तब कोई सहारा काम नहीं आता। इसलिए सुख के समय भी प्रभु का स्मरण करना चाहिए और जीवन को धर्ममय बनाना चाहिए।
नवपद आराधना ओली जी के पावन अवसर पर महासती ने आयंबिल तप की साधना और आराधना का महत्व समझाया। उन्होंने श्रद्धालुओं को नवकार महामंत्र का ध्यान और जाप नियमित रूप से करने की प्रेरणा दी। जिनवचनों के प्रति श्रद्धा और आस्था रखने से मन को शांति मिलती है तथा भयमुक्त जीवन जीने की प्रेरणा प्राप्त होती है। नियमित साधना और आराधना से व्यक्ति को आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है।
महासती ने बताया कि नवपद आराधना का पांचवां दिन ‘नमो लोए सव्वसाहूणं’ की आराधना को समर्पित है। उन्होंने श्रद्धालुओं से इस महामंत्र का जाप करते हुए आत्मिक संतोष और तृप्ति के भाव विकसित करने का आह्वान किया। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार मकड़ी स्वयं जाल बनाकर उसी में उलझ जाती है, उसी प्रकार मनुष्य भी मोह के जाल में फंस जाता है। संयोगों में सुख तलाशना रेत से तेल निकालने जैसा निरर्थक प्रयास है। इसलिए मोह से दूर रहकर ध्यान और साधना के माध्यम से जीवन की दिशा बदलनी चाहिए। जब शरीर भी स्थायी रूप से अपना नहीं है, तो उससे जुड़े संबंधों में स्थायी सुख की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? जीवन के महत्वपूर्ण लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संयम और साधना को अपनाना आवश्यक है।
दृढ़ आराधना से जीवन में आती है आध्यात्मिक शांति : महासती सुश्रिया
धर्मसभा को संबोधित करते हुए महासती सुश्रिया ने कहा कि श्रीपाल और मैनासुंदरी ने नवपद की आराधना कर अपने लक्ष्य को प्राप्त किया। संतों के समागम से हृदय प्रफुल्लित होता है और उनके वचनों का श्रवण जीवन को नई दिशा देता है। सौभाग्य से प्राप्त धर्म, ध्यान और सत्संग के अवसर का लाभ उठाना चाहिए। दृढ़ आराधना, पूर्ण आस्था और समर्पण के साथ की गई प्रार्थना एवं साधना का फल सुखद होता है।
तपस्वियों का किया अभिनंदन
धर्मसभा में रेखा बोरदिया ने आयंबिल तप में अधिकाधिक उत्साह के साथ भाग लेकर धर्मलाभ लेने की अपील की। समता भवन में सेवा देने वाली रेखा शर्मा के 11 आयंबिल की आराधना पूर्ण होने पर संघ ने उन्हें शुभकामनाएं देते हुए साधुवाद दिया। इस अवसर पर महासती ने श्रद्धालुओं को प्रत्याख्यान करवाए और मंगल पाठ सुनाया। धर्मसभा का संचालन शंकर सुराणा ने किया।