नीमच। श्री जैन श्वेतांबर भीडघ्भंजन पार्श्वनाथ मंदिर ट्रस्ट श्री संघ नीमच के तत्वावधान में बंधू बेलडी पूज्य आचार्य श्री जिनचंद्र सागरजी मसा के शिष्य रत्न नूतन आचार्य श्री प्रसन्नचंद्र सागरजी मसा के मुखारविंद से धार्मिक अमृत प्रवचन श्रवण करने चातुर्मास के उपलक्ष्य में मिडिल स्कूल मैदान के समीप पुस्तक स्थित जैनआराधना भवन में आयोजित धर्मसभा में धर्मावलंबियों का जन समुह उमडघ। इस अवसर पर आचार्य श्री ने नूतन वर्ष में सरस्वती ज्ञान की प्राप्ति के लिए संकल्प करने का आह्वान किया।
आचार्य श्री प्रसन्नचंद्र सागर जी महाराज ने कहा कि शुद्ध ज्ञान सरस्वती, समाज सरस्वती, श्रद्धा सरस्वती, सहिष्णुता सरस्वती व प्रसन्नता सरस्वती, यह पांच प्रकार के ज्ञान प्राप्त करने का संकल्प हर व्यक्ति के जीवन में होना चाहिए सन्मार्ग पर जो चला है वह शुद्ध सरस्वती का ज्ञान होता है बैर व देव्ष से मुक्त करें, क्षमा सरस्वती होती है। आत्मविश्वास से भर दे वह श्रद्धा सरस्वती होती है।ईर्ष्या से मुक्त कर दे वह सहीष्णुता सरस्वती होती है और हर परिस्थिति में खुशहाल रखे प्रसन्नता वह सरस्वती होती है। नूतन वर्ष में इन पांच प्रकार की सरस्वती को प्राप्त करने का संकल्प लिया जाए तो वह वर्ष भी सार्थक हो जाएगा।संसार की वस्तु का उपयोग कर सौभाग्य नहीं हम पाप कर्म बांधते हैं।अच्छा शरीर मिला यह सौभाग्य है ।पाप कर्म करते हैं , राग द्वेष पालते हैं यह दुर्भाग्य का कारण है।परमात्मा और आत्मा के तत्व ज्ञान को जानना सौभाग्य है लेकिन जानने के बाद संसार में रहना पाप कर्म का दुर्भाग्य है। व्यक्ति लाखों करोडघें का मंदिर बनवा देगा लेकिन परमात्मा के उपदेश को नहीं समझे तोघ् उसका कोई अर्थ नहीं, लाखों व्यर्थ है परमात्मा के ज्ञान से बुरे पाप कर्म के अंधकार से दूर रहना सीख लेते हैं घर की वस्तु कहां रखी है व्यापार का हिसाब में लाभ हानि कैसे होगा ।समस्त जानकारी है लेकिन जब बात धर्म ज्ञान की आती है तो परिश्रम करने से पीछे हट जाते हैं। फैक्ट्री में बडघ्ी मशीन बंद है तो वह खराब हो जाती है इसी प्रकार परमात्मा की सद्बुद्धि का जो उपदेश है परमात्मा ने प्रदान किया है यदि हम इसका उपयोग नहीं करेंगे तो वह व्यर्थ खराब हो जाएगा।पुण्य धर्म का अवसर मिलता है लेकिन धीरे-धीरे धर्म ज्ञान का अध्ययन करते रहे तो हृदय में स्मरण हो जाएगा और वह दिमाग संसार में रहेगा तो परमात्मा का धर्म ज्ञान विस्मिथ नहीं होगा। परमात्मा धर्मतत्व ज्ञान उपदेश अंतिम समय मोक्ष दिलाने में सहायक होते हैं।धर्म तत्व अध्ययन नहीं करते हैं तो वह ज्ञान व्यर्थ हो जाएगा जिस प्रकार दुकान में 2 दिन ग्राहक नहीं आए तो फिर भी दुकान चलाते हैं उसी प्रकार दो-तीन धर्म ज्ञान का तत्व समझ में नहीं आए तो उसे पढघ्ते रहना चाहिए स्वाध्याय निरंतर करते रहना चाहिए बस स्मृति में आएगा तो धीरे-धीरे ध्यान अंतर की गहराई से समझ आ जाता है निरंतर धर्म स्वाध्याय करना चाहिए तभी धर्म जीवन में आत्मसात होकर बुद्धि में अपना स्थान बनाता है यदि कोई भी व्यक्ति 6 माह तक निरंतर धर्म ज्ञान का अध्ययन करता है तो कोई धर्म तत्व का स्मरण करें तो वह याद हो जाता हैआहार ग्रहण करते समय बीच में बातचीत नहीं करना चाहिए यह पाप कर्म का अंतराय होता है इसका सदैव पालन करते रहना चाहिए पैरों में अखबार या कुछ भी लिखा हुआ कागज कपडघ नहीं आना चाहिए इससे ज्ञान वर्णि कर्म का पाप लगता है ।अखबार पढघ्ना अक्षर लिखा डायपर उपयोग करनाअखबार में आहार ग्रहण करना ज्ञानावरनी पाप कर्म है। इससे सदैव बचना चाहिए आज की शिक्षा धन कमाना तो सिखाती है लेकिन संस्कार नहीं सिखाती है जिसने माता-पिता से दूर रहकर शिक्षा का ज्ञान तो सीख लिया लेकिन सेवा के संस्कार नहीं सिखे तोघ् वह आत्मा जीव जगत परमात्मा के उपकार सत्य धर्म को जीवन में आत्मसात नहीं कर पाता है। धर्म को प्राप्त करना सौभाग्य है ।सम्यक दर्शन का ज्ञान ही सच्चा सुख देता है तभी हमारा जीवन सफल हो सकता है।जिसके पास धर्म तत्व का ज्ञान है वह धर्म क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है और आत्म कल्याण के मार्ग पर निरंतर आगे बढघ्ता रहता है इसलिए प्रतिदिन अमृत प्रवचन सुनना चाहिए तभी जीवन सार्थक हो सकता है संसार के वचन राग द्वेष का कारण है परमात्मा के वचन सुख शांति का प्रतीक है। प्रवचन छोडघ्कर पूजा नहीं करना चाहिए यह भी पाप है।प्रवचन है तो आचरण है ,आचरण हे तो चरित्र है, चरित्र है तो पूजा सफल हो जाती है,अच्छे धर्म वचन को आत्मसात करना चाहिए प्रवचन बिना सच्चा सौभाग्य नहीं होता है। आत्मा जीव दया राग द्वेष हिंसा अहिंसा कम जगत स्वरूप को धर्मशास्त्र ज्ञान को समझ समझना गया तभी आत्मा का कल्याण होगा ।ज्ञान पंचमी ज्ञान को सुनकर आवश्यक है हम प्राचीन काल में पीतल और तांबे के बर्तन में आहार ग्रहण करते थे लेकिन आज आधुनिक युग में चिंतन का विषय है कि हम प्लास्टिक और कागज में भोजन कर रहे हैं हमारा धर्म कहां जा रहा है हम कहां जा रहे हैं हमें चिंतन करना होगा। निरंतर 24 घंटे तकधर्म तत्व की आराधना की साधना करें तभी संसार से मुक्ति मिल सकती है।घ्100 मूल्य की नई कार खरीदते हैं हमें लगता है कि हमें सुख मिला लेकिन दूसरे दिन कोई कांच फोडघ् देता है तो हम दुखी हो जाते हैं फिर यह कर सुख का कारण कहां है यह तो दुख ही देता है।
श्री संघ अध्यक्ष अनिल नागौरी ने बताया कि धर्मसभा में तपस्वी मुनिराज श्री पावनचंद्र सागरजी मसा एवं पूज्य साध्वीजी श्री चंद्रकला श्रीजी मसा की शिष्या श्री भद्रपूर्णा श्रीजी मसा आदि ठाणा 4 का भी चातुर्मासिक सानिध्य मिला। समाज जनों ने उत्साह के साथ भाग लिया। उपवास, एकासना, बियासना, आयम्बिल, तेला, आदि तपस्या के ठाठ लग रहे हैं।धर्मसभा का संचालन सचिव मनीष कोठारी ने किया।