मनासा। चातुर्मास आत्म चेतना को जगाने वाला महत्वपूर्ण समय होता है। चातुर्मास के अंदर यदि हमने अपनी चेतना को नही जगाया तो हम से बड़ा मूर्ख जगत में कोई नही है। हमारे महापुरुषों ने मानव चेतना को जगाने का भरपूर प्रयास किया है। चौमासे में जीवों की उत्पत्ति ज्यादा होती है,इसलिए इन मूक जीवों को अभय प्रदान करना हमारा परम् धर्म होना चाहिए।दयामय जीवन और त्यागमय जीवन ही परम् धर्म है।
उक्त उदगार जैन श्वेताम्बर मूर्ति पूजक श्रीसंघ मनासा के उपाश्रय में विराजित प्रवचन प्रभाविका परम् पूज्य सौम्ययशा श्रीजी मा.सा. ने धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए व्यक्त किये। प्रवचन में उपस्थित सभी जैन धर्मावलंबियों को आपने आगे बताया कि हम जिस जाजम पर जिनवाणी को श्रवण करने के लिए यहाँ बैठे है वो जवाबदारी की जाजम है। दान,तप शील और भाव हमारे शास्त्रों में यह चार धर्म परम् धर्म बतलाए गए है। दिन-दुःखियों का सहारा बनकर हम अपने जीवन को ऊँचा उठा सकते है। परमात्मा की वाणी ठंडे पानी के समान है अतः इसे आत्मसात कर सबसे पहले अपने क्रोध को ठंडा करें। हम बहुत सो लिए है चातुर्मास में आत्म कल्याण हेतु तन,मन,धन से जाग जाइये। इस सुअवसर पर अपने प्रेरक उदगार से परम् पूज्य अर्पिता श्रीजी मा.सा. ने भी वर्षाकाल में धर्म ध्यान का भरपूर लाभ लेने का आह्वान किया।
उल्लेखनीय है कि जैन श्वेताम्बर मूर्ति पूजक श्रीसंघ मनासा को लंबे समयांतराल के बाद साध्वी भगवन्तों के चातुर्मासिक सानिध्य का लाभ मिला है। परम् पूज्या प्रवचन प्रभाविका सौम्ययशा श्रीजी मा.सा.के साथ प.पू. अर्पिता श्रीजी मा.सा.,प.पू. रश्मिता श्रीजी मा.सा.,प.पू.समर्पिता श्रीजी मा.सा.एवं प.पू.पन्थसिध्दि श्रीजी मा.सा.भी वर्षावास हेतु यहाँ विराजित है।