नीमच। संसार में रहते हुए मनुष्य से सामान्य दिनचर्या के मध्य विभिन्न जीवों की वीराधना भूलवश हो जाती है। उस पाप से बचने के लिए चातुर्मास का समय एक पावन अवसर होता है। जब जीव दया के साथ मनुष्य तपस्या और प्रायश्चित कर अपनी आत्मा के कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। चातुर्मास तपस्या के संयम पालन के कारण मनुष्य से पाप का व्यापार भी दूर रहता है। चातुर्मास श्रावक श्राविका के जीवन में आत्म कल्याण के लिए नई दिशा प्रदान करने का पावन अवसर है।
यह बात साध्वी सोम्यरेखा श्री जी महाराज साहब की सु शिष्या साध्वी सुचिता श्रीजी मसा ने कही।वे जैन श्वेतांबर महावीर जिनालय ट्रस्ट विकास नगर श्री संघ के तत्वाधान में श्री महावीर जिनालय विकास नगर आराधना भवन नीमच में आयोजित धर्म सभा में बोल रही थी। उन्होंने कहा कि संसार में रहते हुए सदैव जीव दया का पालन करवाना ही चातुर्मास का उद्देश्य होता है। सांसारिक तनाव से मुक्ति और चातुर्मास आत्मा के आनंद का पर्व होता है। संसार संसार में रहते हुए सामाजिक जीवन जीने के साथ होने वाले पापों से मुक्ति के लिए चातुर्मास में साधु संतों के उपदेश नई दिशा प्रदान करते हैं। संसार के विवाह व्यवहार बंद हो जाते हैं और साधु संतों के विहार बंद होते हैं। साधु संत एक ही जगह स्थिर हो जाते हैं ।वहीं तपस्या के साथ आत्म कल्याण के लिए जीवन को आनंद के साथ आगे बढ़ाते हैं ।चातुर्मास आराधना का पवित्र पर्व है। श्रावक श्राविका चातुर्मास में अनेक तपस्या उपवास साधना अनुष्ठान आदि कर आत्मा को उज्जवल बनाने के लिए पुरुषार्थ करते हैं। यहअहिंसा का पवित्र पर्व है चातुर्मास में कम से कम विराधना ज्यादा से ज्यादा जीव दया का पालन करने का प्रयास करना चाहिए तभी हमारी आत्मा का कल्याण हो सकता है। चातुर्मास का पर्व अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का पवित्र पर्व होता है।
इस वर्षावास में सागर समुदाय वर्तिनी सरल स्वभावी दीर्घ संयमी प.पू. शील रेखा श्री जी म.सा. की सुशिष्या प.पू.सौम्य रेखा श्री जी म सा, प.पू. सूचिता श्री जी म सा, प.पू.सत्वरेखा श्री जी म साआदि ठाणा 3 का चातुर्मासिक तपस्या उपवास जप व विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के साथ प्रारंभ हो गया है। श्री संघ अध्यक्ष राकेश आंचलिया जैन, सचिव राजेंद्र बंबोरिया ने बताया कि आज रविवार को सुबह 9.15 बजे गुरु पूर्णिमा पर विशेष अमृत प्रवचन प्रवाहित होंगे। प्रतिदिन 9.15 बजे विशेष अमृत प्रवचन श्रृंखला का आयोजन होगा। समस्त समाज जनअधिक से अधिक संख्या में पधार कर धर्म लाभ लेवें एवं जिन शासन की शोभा बढ़ावे।