इंदौर। भगवान श्रीराम सनातन के प्रतीक हैं। उनके आचरण को जीवन में लाना ही सनातन धर्म है, पर आज के दौर में सनातन धर्म के नाम पर शीर्ष पदों पर स्थापित महानुभाव भी अंधविश्वास को प्रोत्साहित कर रहे हैं। सनातन के नाम पर तो केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करने की बात रह गई है। अजब तेरी दुनिया गजब तेरा खेल, छंछूदर के बाल में चमेली का तेल... वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए सनातन धर्म के नाम पर पाखंडियों को आश्रय दिया जा रहा है। यह चिंता का विषय है। वास्तव में जिनमें भगवान श्रीराम की मर्यादाओं और सद्गुणों का समावेश है वे ही सच्चे सनातनी हैं।
पतन करने वाला होता है स्वेच्छाचार
महाराजश्री ने कहा कि भगवान की आज्ञा का पालन करो, श्रीराम के आचरण को समझो, अपने जीवन में उतारो, धर्म का पालन करो। भले ही तुम भक्ति न करो, भगवान को बुरा नहीं लगेगा लेकिन धर्म का पालन नहीं करोगे तो उन्हें अच्छा नहीं लगता। भगवान ने मनुष्य को तन-मन तथा बुद्धि, मर्यादा के पालन के लिए दिए हैं। स्वेच्छाचार पतन करने वाला है। संसार में स्वेच्छाचार बहुत बढ़ गया है। आजकल के नवयुवक मां-बाप के अधीन रहना सहन नहीं करते। चाहे जब उठें, चाहे जो बोलें, चाहे जिसके हाथ का खाएं, चाहे जहां जाएं... यह समझदारी नहीं बल्कि मूर्खता है।
सच्चा स्वतंत्र वही है जो जितेंद्रिय हो
डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने कहा कि लोग स्वतंत्रता की बात तो बहुत करते हैं, पर सच्चा स्वतंत्र वही है जो जितेंद्रिय है। जब तक व्यक्ति इंद्रियों का गुलाम है, तब तक वह स्वतंत्र नहीं हो सकता। जिसका मन स्थिर नहीं है वह परतंत्र ही है। स्वतंत्र वह है जिसकी बुद्धि परमात्मा में स्थिर हो गई है। स्वेच्छाचार मनुष्य को पतन की खाई में गिराता है। आजकल वर्ण व्यवस्था भंग किए जाने की बात की जा रही है। शास्त्रों को मानने वाले बहुत कम लोग रह गए हैं, यही हाल वेदों का भी है। राम के आदर्श चरित्र पर कोई चलना नहीं चाहता, भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराम ने भी वर्ण व्यवस्था का माना है।
शास्त्र मर्यादा के अनुसार हो मानव का जीवन
महाराजश्री ने कहा कि सदाचार के बिना जीवन सफल नहीं रहता। सदाचार याने शास्त्र सम्मत आचार। क्या करना है और क्या नहीं करना है यदि यह मन से पूछोगे तो मन धोखा देगा, इसलिए मन से नहीं शास्त्रों से पूछो, संतों से पूछो। मानव का जीवन शास्त्र मर्यादा के अनुसार होना चाहिए। आज के लोग शास्त्र की मर्यादा नहीं पालते, वे सोचते हैं हम सबसे बड़े विद्वान हैं। हमारे पूर्वज महान ऋषि थे। उनको अच्छा लगे ऐसा जीवन जीना चाहिए, क्योंकि हम ऋषि संतान हैं। संयम हो, सदाचार हो, सेवा हो, मर्यादा का बराबर पालन हो, तब जीवन सुधरता है। भगवान श्रीराम प्रत्येक लीला में धर्म की मर्यादा का पालन करते हैं। पाप करने से भय मानते हैं, पर आज के लोगों को पाप का भय नहीं लगता। जिनको पाप का भय नहीं लगता, उनका मन ही अशांत रहता है। तुम किसी का भय मत मानो परंतु दो वस्तुओं का भय मानो, पाप और ईश्वर का।