अशोकनगर। जिले अंतर्गत आने वाले पिपरई से मात्र 15 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम पंचायत गारेंठी की पहचान भरका कुंड ओर बारिश में प्राकृतिक झरना दंतकथाओं के अनुसार भरखा में पांडवों ने अपना अज्ञातवास काटा था। यहां पर प्रतिवर्ष मकर संक्रांति पर दो दिवसीय विशाल मेले का आयोजन होता है।
इस मेले में हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर भगवान भोलेनाथ का पूजन करते हैं। भरखा में बड़ी बड़ी चट्टानों के नीचे कुंड में भगवान शिव ओर हनुमान जी का मंदिर है।
वारिस के समय यहां पर प्राकृतिक झरना आकर्षण का केंद्र बिंदु होता हे। यहां पर रोजाना आसपास सहित दूसरे जिलों से लोग आते हैं। ओर खूब सेल्पी ओर यहां का मनमोहक प्राकृतिक सौंदर्यता को कैमरे में कैद कर ले जाते हैं।ओर यही पर भोजन बना खाकर आनंद लेते हैं। वारिस के इस मौसम में यहां पर रोजाना बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं।
दंतकथाओं के अनुसार यहां पर पांडवों ने अज्ञात वास काटा था।
अज्ञातवास के दौरान अचानक अधिक पानी आने पर भीम ने अपने हाथ से पानी को रोका था। यहां भीम द्वारा कोहनी रखने का स्थान भी बना हुआ हे। भारखेस्वर में एक विशाल कुंड बना हुआ है। इस कुंड में हमेशा पानी भरा रहता हे। जिसकी गहराई का आज तक पता नहीं लग सका है।
7000 साल पुराने शेल चित्र बने पहचान,रख रखाव के अभाव में हो रहे खंडित
भरखा से थोड़े ही पास में चीनिया में आदिमानवों के रहने के प्रमाण मिले है। यहां पर नदी किनारे आदिमानवों द्वारा बनाए गए शैलचित्र मिले हैं। यह शैलचित्र 4 से 7 हजार साल पुराने हैं। यहां पर पाषाण काल के औजार भी मिले हैं। इन औजारों से आदिमानव अपने जीवन यापन के लिए जानवरों का शिकार करते थे।ओर नदी किनारे स्थित गुफाओं में रहते थे। इतिहासकार हेमंत दुवे शिझक ने बताया की भरखा नानोंन नदी किनारे बड़ी बड़ी विशाल काए चट्टानों पर आदिमानवों ने जो शैलचित्र बनाए हैं, उनका निर्माण गेरूआ ओर लाल रंग से किया हे। रंग हजारों साल बाद भी फीका नहीं हुआ है। इससे सिद्ध होता हे कि आदिमानवों को रसायन विज्ञान का ज्ञान भी था। इन शैलचित्रों को लेकर देश के कई विश्वविद्यालयों ने विभिन्न शोध भी किए है।
यहां 80 साल से लग रहा मेला
भारखेश्वर में पिछले करीब 80 साल से मेला लग रहा हे। मकर संक्रांति मेले का शुभारंभ स्वर्ग शिवराज सिंह सोलंकी लंबरदार परिवार के कार्यकाल से प्रारंभ हुआ जिसे आज उनके पुत्र राजपाल सिंह सोलंकी जिम्मेदारी के साथ सफल आयोजन करवाते हैं।