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July 21, 2025, 12:22 pm
KHABAR : बच्चों में बीमारी, विकलांगता और मृत्यु का कारण अब भी संक्रमण, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी खास कारण, जागरूकता जरूरी, नेशनल कांफ्रेंस आईडीकॉन में बोले एक्सपर्टस, पढे़ खबर

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इंदौर। आज हम जीनोमिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे आधुनिक विषयों की बात कर रहे हैं, लेकिन भारत में बच्चों में बीमारी, विकलांगता और मृत्यु का सबसे सामान्य कारण अब भी संक्रमण और संक्रामक रोग ही हैं। यह अत्यंत आवश्यक है कि ऐसी कांफ्रेंस नियमित रूप से आयोजित की जाएं, जो संक्रामक रोगों पर केंद्रित हों, ताकि प्रेक्टिस कर रहे डॉक्टर्स और पीजी स्टूडेंट्स को सही दिशा मिलती रहे।


यह बात इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (आईएपी) की आईडी चौप्टर की नेशनल कांफ्रेंस आईडीकॉन में अध्यक्ष डॉ. नीलम मोहन ने कही। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश हमारा टारगेट होगा, जहां व्यवस्थाओं पर एकजुट होकर ग्राउंड लेवल पर काम करना होगा। पिछले पांच सालों में प्रदेश में बहुत काम हुआ है, लेकिन इसके बावजूद यहां पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर भारत में सबसे अधिक दरों में से एक है। भारत में प्रति 1 हजार नवजातों में से 56 की मृत्यु हो रही है जबकि राष्ट्रीय आंकड़ा 37 बच्चों का ही है।


इसी तरह नवजात शिशु मृत्यु दर भी देश में सबसे अधिक मध्य प्रदेश में ही देखी जा रही है। इसके कारण में संक्रमण सबसे बड़ी वजह है, जिसमें निमोनिया, सेप्सिस और डायरिया प्रमुख हैं। यह संक्रमण 35-45 प्रतिशत तक पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मौतों का सबसे बड़ा कारण है।


टीकाकरण में गिरावट और खतरनाक परिणाम
नेशनल चेयरपर्सन डॉ. भास्कर शेनॉय ने कहा पिछले एक दशक में खासकर कोविड के बाद के पांच वर्षों में पब्लिक हेल्थ केयर सेक्टर में बुनियादी ढांचे में काफी सुधार हुआ है। इसमें पीआईसीयू, एनआईसीयू, वेंटिलेटर जैसी सुविधाओं का विकास और कई मेडिकल कॉलेजों में इनका विस्तार हुआ है।


कोविड-19 के दौरान लाखों बच्चों को समय पर टीके नहीं मिल पाए। इसका परिणाम है खसरे और अन्य बीमारियों का फिर से फैलना। निमोनिया, एंसेफेलाइटिस (दिमाग की सूजन), दृष्टि दोष, कान, मूत्र संक्रमण, इनका इलाज समय पर न हो तो यह मृत्यु का कारण बन सकता है। ऐसे में पीडियाट्रिशियन और माता-पिता को चाहिए कि बच्चों का समय पर यह टीकाकरण जरूर हो।


ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी
ऑर्गेनाइजिंग चेयरपर्सन डॉ. केके अरोरा ने कहा कि इंदौर और भोपाल जैसे बड़े शहरों में सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन ग्रामीण और जरूरतमंद क्षेत्रों में अभी भी बहुत काम बाकी है। टीकाकरण को लेकर भी बहुत जागरूकता आई है लेकिन अभी भी लोगों को इसका महत्व समझाना पड़ता है। हर डेढ़ लाख बच्चों पर सिर्फ एक बाल रोग विशेषज्ञ है।


बच्चों के स्वास्थ्य और संक्रामक रोगों पर विशेषज्ञों की इस महत्वपूर्ण कांफ्रेंस में कई क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। इसमें क्रिटिकल केयर और आईसीयू विशेषज्ञ, संक्रमण व एंटीबायोटिक विशेषज्ञ, नवजात रोग विशेषज्ञ (नियोनेटोलॉजिस्ट) लिवर विशेषज्ञ, फार्मेसी विशेषज्ञ सभी ने संक्रमण पर चर्चा की।

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