बड़वानी। जिले की स्थापना को 28 वर्ष पूरे हो चुके हैं। ढाई दशक बीत जाने के बावजूद आज भी यहां के लोग मूलभूत सुविधा से दूर हैं। लोग आज भी सड़क मार्ग पर ही निर्भर हैं। दशकों से रेल का मुद्दा समय-समय पर जन चर्चाओं का केंद्र बना रहा है। हालांकि लोग अभी भी मूलभूत सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। मध्यप्रदेश के अंतिम छोर पर महाराष्ट्र सीमा पर बसा बड़वानी जिला पुराने किलों और इमारतों के लिए निमाड़ का पेरिस माना जाता रहा है। वर्तमान में कई रियासतकालीन भवन और किले अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वहीं, दूसरी ओर जिले में स्कूल-कॉलेजों से लेकर अस्पतालों की कमियां हैं।अतिथि शिक्षकों के भरोसे चल रही स्कूल समाजसेवी अजीत जैन ने बताया कि देश की आजादी को 7 दशक बीत चुके हैं और बड़वानी जिले की स्थापना हुए भी 28 साल पूरे हो चुके हैं। लेकिन, ग्रामीण और खासकर पहाड़ी अंचल में आज भी स्वास्थ्य सेवाएं दयनीय और शिक्षा व्यवस्था बदहाल नजर आ रही है। जिला अस्पताल सहित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर स्टाफ की कमी और अंचल के स्कूल अतिथि शिक्षकों के भरोसे संचालित हो रहे हैं। पहाड़ी अंचल के कुछ क्षेत्रों में चार पहिया वाहन की आवाजाही असंभव है। प्रशासन द्वारा व्यवस्था सुधारने का प्रयास किया गया। लेकिन प्रयास नाकाफी साबित हुए। जिले में कई सरकारी स्कूल बिजली विहीन हैं। जिले के पाटी विकासखंड के ग्राम खेरवानी, सेमलेट, पीपरकुंड, चेरवी, सागमाल सहित कई पहाड़ी इलाकों के निवासी गड्ढे खोदकर झीरी से पानी निकालते हैं। नदी नलों का दूषित पानी पीने को मजबूर है।
अधिवक्ता शिवपाल सिंह सिसोदिया ने बताया कि जिले की स्थापना के बाद सबसे बड़ी मांग रेल लाइन रही है। क्योंकि रेल के बगैर जिले में विकास की रफ्तार असम्भव नजर आती है। बड़वानी में अधिकतर लोग कृषि पर निर्भर हैं। यहां मुख्य रूप से केला, मिर्च और टमाटर सहित कपास की फसल होती है। उत्पादित फल देश-प्रदेश सहित विदेशों तक एक्सपोर्ट होते हैं। NBA (नर्मदा बचाओ आंदोलन) नेत्री मेधा पाटकर ने कहा, "विकेंद्रीकरण हो रहा है, लेकिन विकेंद्रीकरण शहर स्तर पर नहीं हो सकता इसके लिए गांव-गांव तक देखना पड़ता है। जल जीवन योजना होने के बावजूद कई गावों में पानी की समस्याएं हैं."बड़वानी जिले के 28 वें स्थापना दिवस पर जश्न के बीच ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी से जूझ रहे हैं। जिले के दूरदराज इलाकों में आज भी शुद्ध पेयजल की किल्लत, स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव, शिक्षा की खराब स्थिति और जर्जर सड़कें स्थानीय लोगों के लिए गंभीर चिंता का विषय बनी हुई हैं।दूरदराज के गांवों में उच्च शिक्षा, स्कूलों में शिक्षकों की कमी और बुनियादी शैक्षणिक सुविधाओं की लचर व्यवस्था के कारण बच्चों के भविष्य पर असर पड़ रहा है।अधिकांश ग्रामीण इलाकों में कनेक्टिविटी की समस्या है। कई गांवों और फलियों तक पक्की सड़कें (CC Road) न होने के कारण आपातकालीन स्थिति में एंबुलेंस या अन्य वाहन पहुंचना भी मुश्किल हो जाता है।
प्रभारी मंत्री गौतम टेटवाल ने बताया कि हमारी टीम द्वारा पेयजल की समस्याओं को लेकर समाधान कर रहे हैं। धरातल पर पानी की व्यवस्था कर रहे हैं। मां नर्मदा का आशीर्वाद हमें मिल रहा है। शुद्ध पानी हर मजरे,टोले हर फलिये में मिले इसको लेकर सरकार लगातार प्रयास कर रही है।
कलेक्टर जयति सिंह ने बताया कि जिले में डाक्टरों और स्टॉप की कमी को लेकर हम प्रयास कर रहे कि हमें और स्पेशल डॉक्टर मिल जाए तो व्यवस्था और बेहतर होगी।
बड़वानी जिले में बुनियादी समस्याओं की स्थिति:पेयजल की समस्या: बड़वानी के कई ग्रामीण अंचलों, विशेषकर पाटी (Pati) और अन्य पहाड़ी इलाकों में गर्मी के दिनों में प्राकृतिक जल स्रोतों के सूखने और हैंडपंपों के खराब होने के कारण पीने के पानी का गंभीर संकट बन जाता है।स्वास्थ्य सेवाएं: पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है। गंभीर बीमारियों के इलाज और इमरजेंसी के समय ग्रामीणों को मीलों का सफर तय करना पड़ता है।शिक्षा की स्थिति: ग्रामीण इलाकों में कई छात्रों को बीच में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। साक्षरता और शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने के लिए जमीनी स्तर पर अभी और प्रयासों की आवश्यकता है।सड़कों की हालत: कई दूरदराज के आदिवासी बहुल गांवों तक पक्की सड़कें नहीं हैं। आवागमन के साधनों के अभाव में ग्रामीणों को रोजमर्रा की जिंदगी में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।