ग्वालियर। मध्य प्रदेश के ग्वालियर नगर निगम में इस वक्त बैठकों का नहीं, बल्कि श्लापता फाइलोंश् और घोटालों का दौर चल रहा है। साल 2026 के 5 महीने बीत चुके हैं, लेकिन जनता के काम से ज्यादा श्विशेष अभियाचित सम्मेलनोंश् पर घमासान जारी है। साधारण सभा तो भूल जाइए, यहां तो कागज ही गायब हैं। और इन सब का खामियाजा बेकसूर जनता को भुगतना पड़ रहा है।
तीन माह में होनी चाहिए साधारण सभा
वर्तमान हालातों को देखकर ऐसा लग रहा है कि ग्वालियर नगर निगम को विकास से परहेज़ हो गया है, और शहर की संसद अब सिर्फ अखाड़ा बनकर रह गई है। नियम कहता है हर तीन महीने में साधारण सभा होनी चाहिए, ताकि आपके वार्ड की सड़क, पानी और सीवर की समस्या हल हो। लेकिन ग्वालियर में साधारण शब्द ही असाधारण हो गया है। 2026 में फरवरी में बजट सत्र के बाद साधारण सभा गायब और उसकी जगह आ गई विशेष अभियाचित सम्मेलनों की बाढ़। कांग्रेस पार्षद मनोज राजपूत कहते हैं। जिसके मुद्दे 5 महीने में भी पूरे नहीं हो पाए हैं।
बार बात स्थगित हो रहे विशेष सम्मेलन
नगर पालिक निगम अधिनियम साफ कहता है। हर तीन महीने में कम से कम एक साधारण बैठक जरूरी है। लेकिन 2026 में 23 अरब 66 करोड़ का बजट तो पास हो गया, पर जमीन पर गड्ढे वही हैं। साधारण सभा की जगह जो श्विशेष सम्मेलनश् बुलाए जा रहे हैं, वो भी बार-बार स्थगित हो रहे हैं। 23 अप्रैल की बैठक 11 मई, फिर 18 मई, अब 11 जून तक टाल दी गई। जिसका कारण है कि जिन मुद्दों पर बात होनी होती है, उनमें या तो संबंधित जिम्मेदार गायब होते हैं, या फिर उन मुद्दे से जुड़ी फाइलें।
सभापति ने लिया निर्णय
लगातार हंगामे और फाइलें गायब होने से परेशान सभापति मनोज सिंह तोमर ने इस बार ऑन-स्पॉट एक्शन लिया। पहला फैसला - स्मार्ट सिटी के जो काम पूरे हो चुके हैं, उन्हें तुरंत नगर निगम को वापस लिया जाए। दूसरा - स्मार्ट सिटी के जो अफसर निगम में वापस आना चाह रहे हैं, उन पर रोक। तीसरा - केबल घोटाले में जिस कर्मचारी को निलंबित किया गया था, अब उस पूरे मामले की जांच के लिए समिति बना दी गई है। सभापति ने माना कि सदन के सामने मुद्दे बड़े हैं, पर विभागों के पास कागज ही नहीं हैं।
अभी कई घोटालों की फाइलें गायब
ऐसे कई घोटाले है जिनमें कभी फाइलें गायब हो रही है तो कभी अधिकारी बदल जाते हैं। और ये सभी लंबे समय से चली आ रही है। चाहे एलईडी लाइट घोटाला हो या वर्कशॉप घोटाला, होर्डिंग घोटाला, 15 वित्त आयोग से मिली राशि आबंटन घोटाला सहित और भी कई घोटाले हैं। जो लंबे समय से ऐसी फाइलों में दबे हैं जो मिल ही नहीं रही हैं। बड़ी बात तो ये है जब भी इन फाइलों का जिक्र जोर पकड़ता है। मौजूदा जिम्मेदारों को नोटिस देकर मामलों को शांत कर दिया जाता है।