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July 9, 2026, 2:16 pm
KHABAR : गृह विभाग में ही अटकी डीपीसी, हाईकोर्ट के आदेश के बाद प्रमोशन पर फिर लगा ब्रेक, हजारों पुलिसकर्मियों को झटका, पढे़ खबर

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मऊगंज। मध्यप्रदेश पुलिस महकमे में सालों से जंग खा रही पदोन्नति की फाइलें जब हाईकोर्ट के हंटर के बाद खुलीं, तो लगा कि अब इंसाफ होगा। लेकिन, सिस्टम की सुस्ती और नीतिगत यू-टर्न ने हजारों वर्दीधारियों की उम्मीदों पर फिर से पानी फेर दिया है। जिस प्रक्रिया को अदालत की फटकार के बाद युद्धस्तर पर शुरू किया गया था, उसे पुलिस मुख्यालय (PHQ) ने एक झटके में आगामी आदेश तक फ्रीज कर दिया है। हैरानी की बात यह है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर प्रदेश के दूसरे विभागों में पदोन्नति (DPC) की गाड़ियां सरपट दौड़ रही हैं, लेकिन खुद मुख्यमंत्री के प्रभार वाले ‘गृह विभाग’ में ही आकर ब्रेक लग गया है।


कोर्ट ने दिया था 30 दिन का अल्टीमेटम
लंबे समय से कार्यवाहक उच्च पद प्रभार से वंचित मऊगंज के सब-इंस्पेक्टर सहित सूबे के कई पुलिस अधिकारियों ने जब अदालत का दरवाजा खटखटाया, तो हाईकोर्ट ने साफ कहा था कि पुलिस रेगुलेशन के तहत प्रभार देने पर कोई रोक नहीं है। कोर्ट ने सख्त लहजे में 30 दिन के भीतर प्रक्रिया पूरी कर रिपोर्ट सौंपने को कहा था। अदालती आदेश के बाद PHQ में मानो करंट दौड़ गया था। आनन-फानन में जिलों और रेंज स्तर पर समितियां बनीं, एसपी स्तर से पात्र अफसरों की सूचियां मंगवाई गईं। लगा कि बरसों का इंतजार अब खत्म होने को है, लेकिन ऐन वक्त पर ‘ऊपर’ से खेल हो गया।


2 जुलाई के फरमान ने फेरा पानी
आखिरी पायदान पर पहुंच चुकी इस कवायद को 2 जुलाई 2026 को जारी PHQ के एक नए आदेश ने ठंडे बस्ते में डाल दिया। आदेश में सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के 30 जून के एक पत्र और विधिक परामर्श का हवाला देकर पूरी प्रक्रिया को आगामी आदेश तक सस्पेंड कर दिया गया है। इस ‘प्रशासनिक यू-टर्न’ ने सब-इंस्पेक्टरों से लेकर निरीक्षकों तक को वापस निराशा की उसी कतार में खड़ा कर दिया है, जहां वे सालों से खड़े थे।


कार्यवाहक’ का ठप्पा हटाने को तरस रहे 183 DSP
सिर्फ प्रभार ही नहीं, नियमित पदोन्नति का संकट भी पुलिस महकमे में नासूर बन चुका है। सूबे के 183 कार्यवाहक डीएसपी आज भी नियमित विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) की बैठक का इंतजार कर रहे हैं। साल 2024 में पहले 103 और फिर बाद में कुल 183 निरीक्षकों को कार्यवाहक डीएसपी की कमान सौंपी गई थी। ये अफसर सिर्फ इसलिए तरस रहे हैं ताकि उनके नाम के आगे से ‘कार्यवाहक’ का ठप्पा हटे और उनके करियर का आगे का रास्ता साफ हो सके।


जब हर जगह हरी झंडी, तो गृह विभाग में ‘नो एंट्री’ क्यों?
एमपी लोक सेवा आयोग (MPPSC) में 6 जुलाई से विभिन्न विभागों की डीपीसी बैठकों का दौर शुरू हो चुका है। सामान्य प्रशासन, राजस्व और स्कूल शिक्षा जैसे बड़े विभागों में प्रमोशन की लिस्ट फाइनल हो रही हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस गृह विभाग की कमान खुद सूबे के मुखिया संभाल रहे हैं, वहां डीपीसी की तारीख तक तय क्यों नहीं हो पा रही है?


क्या यह सिर्फ एक सामान्य प्रशासनिक अड़ंगा है, या फिर इसके पीछे कोई बड़ी कानूनी और नीतिगत खिचड़ी पक रही है? कोर्ट की अवमानना के जोखिम के बावजूद इस प्रक्रिया को क्यों रोका गया, इसका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है। लेकिन इतना साफ है कि अपनी जान हथेली पर रखकर ड्यूटी करने वाले सूबे के हजारों पुलिसकर्मी आज खुद को प्रशासनिक चक्रव्यूह में ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

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