भगवानपुरा। सोलह श्राद्ध के दौरान मनाया जाने वाला निमाड़ का प्रसिद्ध 16 दिवसीय पारंपरिक संझा माता पर्व शुरू हो गया है। पर्व को लेकर नगर और ग्रामीण क्षेत्रों की कुंवारी बालिकाओं में खास उत्साह देखने को मिल रहा है। शाम होते ही घर-घर संझा माता के पारंपरिक गीतों की गूंज सुनाई देने लगी है।
संझा पर्व मुख्य रूप से कुंवारी कन्याओं द्वारा मनाया जाता है। बालिकाएं प्रतिदिन शाम को एकत्रित होकर संझा माता की पूजा-अर्चना करती हैं। इसके बाद घर-घर जाकर पारंपरिक गीत गाए जाते हैं। आरती के बाद बालिकाओं द्वारा प्रसादी तैयार कर उसका वितरण भी किया जाता है।
गोबर और प्राकृतिक सामग्री से सजती हैं आकृतियां
संझा पर्व के दौरान बालिकाएं घर की दीवारों पर गोबर और प्राकृतिक सामग्री से संझा माता की अलग-अलग आकृतियां बनाकर उन्हें सजाती हैं। हर दिन संझा माता के अलग-अलग स्वरूप तैयार किए जाते हैं। इस दौरान बालिकाएं सामूहिक रूप से पारंपरिक गीतों का गायन कर पूजा-अर्चना करती हैं।
लोक संस्कृति और नई पीढ़ी का जुड़ाव
बदलते दौर में भी बालिकाओं द्वारा उत्साह के साथ संझा पर्व की परंपरा निभाना निमाड़ की समृद्ध लोक संस्कृति की झलक प्रस्तुत करता है। गणेश विसर्जन के बाद शुरू हुए इस पर्व से क्षेत्र में धार्मिक और पारंपरिक माहौल बना हुआ है। संझा माता के गीत और पूजा की यह परंपरा नई पीढ़ी को अपनी लोक संस्कृति से जोड़ने का माध्यम भी बनी हुई है।