नीमच। बैमौसम बारिश के साथ हुई ओलावृष्टि से फसलों में भारी नुकसान हुआ है। बिना सर्वे किए फसल बीमा और मुआवजा दिला पाएंगे सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेता। उक्त बात किसान चम्पालाल गुर्जर ने कही।
चम्पालाल गुर्जर ने कहा कि इस धरती पर सबसे ज्यादा कमरतोड़ मेहनत करने वाला अगर कोई है तो वह किसान है और किसान मानवता का पालक है। इसे किसानों की दुर्दशा कहेंगे या नसीब का खेल, एक तरफ किसान पूरी तरह से प्रकृति के भरोसे और दूसरी ओर शासन और सरकार के नुमाइंदों के भरोसे और विश्वास पर कर्म करता है। किसान के नसीब ना लाभ की गारंटी और ना लागत की गारंटी बस एक कर्म शील होकर अपना कार्य करता रहता है।
गुर्जर ने कहा कि बंजर धरती को चीरकर कड़ी मेहनत से काम कर फसल तैयार करता है किसान। चुनाव में किसानों के नाम से वोट लेकर राजनीति करते हैं नेता। अपने स्वार्थ की खातिर वोट लेने के लिए किसानों का जहां तक बेटा बन जाते हैं और भोले-भाले किसानों को गुमराह करके अपना स्वार्थ सिद्ध कर लेते हैं और फिर किसानों पर आए संकट के समय किसानों को भूल जाते हैं। सदियों से किसान जहां था आज भी वहीं पर है, ना समय पर अच्छा खाना खाता है, ना ही कभी अच्छे कपड़े पहनता है, और ना समय पर कहीं घूमना। उसका नसीब सुबह उठकर अपने कर्म के प्रति लग जाता है। इस आशा में कि कभी तो भगवान अच्छा करेगा, परंतु कभी अल्प वर्षा तो कभी अतिवृष्टि तो कभी शीतलहर से पाला पड़ने से तो कभी बेमौसम बारिश एवं ओलावृष्टि से किसान को पूरी फसल चौपट हो जाने के बाद वह दुखी और निराश होकर जब सरकार के नुमाइंदों की तरफ आशा भरी निगाहों से टकटकी लगाए बैठा रहता है। परन्तु कई बार आशा, निराशा में बदल जाती है फिर भी किसी से कुछ नहीं बोलता है। सत्ता में बैठे नुमाइंदे अपने लालच के खातिर ऐसी नीतियां एवं कानून बनाते हैं कि लाभ मिलना तो दूर उसका चक्कर लगाने में और आर्थिक नुकसानी होता है इस विपरीत परिस्थिति में जहां विपक्ष का काम होता है किसानों की आवाज उठाने का विपक्ष में बैठे जनप्रतिनिधि केवल सत्ता पक्ष पर अपने राजनीतिक लाभ हानि का गणित लगाकर प्रेस नोट जारी कर इतिश्री कर लेते हैं और किसान आज भी जहां था वहीं एक आस में रहता है कि कभी तो हमारा भला होगा। जब तक सिस्टम उस सरकार और जनप्रतिनिधि मिलकर अन्नदाता किसान की पुकार नहीं सुनेंगे तब तक देश की मुख्यधारा से किसान कभी नहीं जुड़ पाएगा और केवल किसान के नाम से राजनीति होती हैं और आगे भी होती रहेगी। बस बड़े-बड़े विज्ञापन, बड़े-बड़े स्टेटमेंट, बड़ी-बड़ी नीतियां, सार्वजनिक घोषणाए और धरातल पर कुछ नहीं। यही एक सच्चाई है और इस कड़वी सच्चाई के बाद सभी सिस्टम के नुमाइंदे इसी और अपना दिल और दिमाग लगाएंगे कि कैसे अपना हिस्सा निकाला जाए।
किसान चम्पालाल ने आगे कहा कि हमारे क्षेत्र की मुख्य फसल अफीम है। जिस पर पूरे क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां संचालित है। चाहे राजनेताओं के कार्यक्रम हो या सत्ता पक्ष को वोट लेना हो या विपक्ष में बेठे नेताओं को बयान बाजी करना हो सबको केवल किसान की दुर्दशा पर नजर रहती हैं कि कब इनका इस्तेमाल कर लाभ लिया जाए। पिछले कई वर्षों से अफीम की खेती पर केवल कोरी बयान बाजी की जाती है, जबकि धरातल और सच्चाई से सब लोग वाकिफ हैं। आज भी भोले भाले किसान सैकड़ों जेलों में बंद हैं और मलाई केवल सिस्टम में बैठे लोग खाते हैं। यह एक कड़वी सच्चाई है। अब भी समय है जागो किसान साथियों अपने हक के लिए जागो और उठो। अपने अधिकार के लिए आवाज उठाओ। आपके साथ हमेशा तत्पर किसान चंपालाल गुर्जर।