एमपी में एक बार फिर विधानसभा चुनाव की बिसात बिछ चुकी है, लेकिन सवाल यह उठता है कि चुनाव दर - चुनाव आखिर बदलता क्या है, क्या सरकारों के आने-जाने से आम आदमी को कुछ फर्क पड़ता है या फिर आम आदमी के जीवन में कुछ बदलता है, क्या सरकारों के फैसले समाज के अंतिम छोर पर जीने वाले लोगों की ज़िन्दगी में कुछ बदलाव ला पाते हैं। इस चुनावी साल में उन मुद्दों को छूने की ज़रूरत है जो आम आदमी के सरोकार से जुड़े हैं और उनकी पड़ताल इसलिए भी ज़रूरी है कि आखिर ये सरकार करती क्या है और इन सरकारों में भेजे जाने वाले विधायक इन मुद्दों पर कितना संवेदनशील रुख रखते हैं।
आज हम बात करेंगे एमपी के ऐसे शहर जहां आजादी के बाद से हर दिन आबादी घट रही है, और साल दर साल इस शहर को छोड़कर यहां के बाशिंदे अन्य जगह पलायन कर रहे हैं, जी हां यह शहर है नीमच जिले का रामपुरा जहां इस समय करीब 20 हज़ार की आबादी बची है। इस शहर के बुरे दिन तब शुरू हुए जब गांधीसागर डेम अस्तित्व में आया और इस नगर की सीमा रेखा रिंगवाल बनाकर खींच दी गयी की अब यह शहर इससे आगे नहीं बढ़ेगा। जबकि राजे रजवाड़ो के समय रामपुरा एक प्रमुख बिज़नेस सेंटर था, यहां जिनिग फैक्ट्रियां थी और आसपास के करीब 267 गाँव थे जो इस डेम की डूब के भेंट चढ़ गए।
रामपुरा का दुर्भाग्य यह रहा की इसके एक तरफ अरावली की पहाड़िया है तो दूसरी तरफ गांधी सागर का पानी ऐसे में इस शहर के विकास की सारी संभावनाये दफन हो गयी और तब ही से धीरे-धीरे यहां के बाशिंदे रामपुरा से पलायन करने पर मजबूर हो गए जो सिलसिला अब तक जारी है।
लेकिन इस दुर्भाग्य में एक कड़ी अब और जुड़ गयी है वह यह की सरकार अब गांधी सागर के वन्य जीव अभ्यारण में चीते लाने जा रही है, जिसके लिए यहां घास के जंगल बनाने के लिए 20 करोड़ रूपए का प्रोजेक्ट सरकार को भेजा गया है। रामपुरा के सामाजिक कार्यकर्ता तरुण कीमती कहते हैं पहले रामपुरा वासियों के लिए चार दिशाओं में से दो दिशाए पानी और पहाड़ की वजह से बंद थी, लेकिन अब चीता अभ्यारण बनने से तीसरी दिशा भी बंद होने जा रही है। वे कहते हैं रामपुरा से झालवाड़ रास्ते पर अब दिन ढलने के बाद लोगों ने निकलना बंद कर दिया है, क्योकि यहाँ वन्य प्राणी आये दिन मिल जाते हैं और इस क्षेत्र में पैंथरों की आवाजाही आम बात हो चुकी है।
रामपुरा के ही डॉक्टर अजय सिसौदिया कहते हैं सरकार डेम बनाये, वन्य जीव अभ्यारण बनाये, लेकिन उन्हें यहां के बाशिंदो के बारे में भी सोचना चाहिए। आखिर नौजवान पीढ़ी इस नगर में करेगी क्या, उनका भविष्य अंधकार की भेंट चढ़ रहा है। यहीं के बाशिंदे शेख इशाक और राम मेहता कहते हैं जो सक्षम लोग है वे तो किसी अन्य शहर में बस जाएंगे, लेकिन गरीब आदमी क्या करेगा?
रामपुरा जिस मनासा विधानसभा में आता है। यहां के स्व. सुंदरलाल पटवा सरकार में सीएम रहे हैं, इसके अलावा नरेंद्र नाहटा, कैलाश चांवला वो नाम है जो यहाँ से चुनें जाने के बाद दो दो बार सरकार में मंत्री रहे और तो और सरकार में वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा का पैतृक गाँव तो रामपुरा ही है, लेकिन उसके बावजूद किसी ने इस नगर की सुध नहीं ली और यहाँ से पलायन बदस्तूर जारी है, धीरे-धीरे यह शहर वीरानी की तरफ बढ़ता जा रहा है और इन्हीं हालातों में एक बार फिर चुनाव होंगे, वोट पड़ेंगे, कोई मंत्री या कोई विधायक बनेगा, लेकिन रामपुरा के बाशिंदो के जीवन में शायद कुछ नहीं बदलेगा।