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August 23, 2023, 4:19 pm
KHABAR : जो आत्म स्वभाव को भूल जाता है, वह उन्नति की प्राप्ति नहीं कर सकता- मुनिश्री दर्शित सागर जी, पार्श्वनाथ भगवान का निर्वाण महोत्सव बड़े धूमधाम के साथ मनाया, पढ़े खबर 

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सिंगोली। नगर के पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर पर मुनिश्री सुप्रभ सागर जी महाराज व मुनिश्री दर्शित सागर जी महाराज के सानिध्य मे 23 अगस्त बुधवार को पार्श्वनाथ भगवान का महा मस्तकाभिषेक व निर्वाण महोत्सव बड़े धूमधाम के साथ मनाया गया। 
प्रातः काल श्री जी का अभिषेक व शांतिधारा हुई मुलनायक श्री पार्श्वनाथ भगवान पर प्रथम शान्तिधारा करने का सौभाग्य कैलाशचन्द्र मनोज कुमार मोहिवाल परिवार को प्राप्त हुआ व उसके बाद विधान पुजन सम्पन्न हुआ। भगवान को निर्वाण लड्डू चढ़ाने का सौभाग्य शौभालाल अभिषेक कुमार ठोला परिवार व समाजजनों को प्राप्त हुआ। उसके बाद मुनिश्री ससंघ के मंगल प्रवचन हुए। 
मुनिश्री ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि संसार के सारे प्राणी सर्वोत्कृष्ट की प्राप्ति करना चाहते है। उसे प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को अपना जीवन जलवत बनाना होगा। जल में तरलता होती है, वह जिस बर्तन में जाता है, उस आकार में परिवर्तित हो जाता है। जैसा रंग डालो उस रंग का हो जाता है। वह गर्म करने पर भी उबलता है परंतु उसमें उफान नहीं आता है। इन सब परिवर्तनों के बाद भी वह अपना स्वभाव नहीं छोड़ता है। उसकी शीतलता व शान्त प्रकृति में कोई अन्तर नहीं आता है। उसी प्रकार व्यक्ति को भी परिस्थिति के अनुरूप स्वयं को ढालना चाहिए, जैसे व्यक्ति मिले उसके अनुरूप परिवर्तन करना चाहिए परन्तु अपने आत्म स्वभाव को नहीं छोड़ना चाहिए। जो आत्म स्वभाव को भूल जाता है, वह उन्नति की प्राप्ति नहीं कर सकता है। जल के समान जीवन में सहिष्णुता लाना चाहिए भगवान पार्श्वनाथ स्वामी ने भी अपने जीवन को जलवत तरल, सरल व सहिष्णु बना था, इस कारण वे उत्थान को प्राप्त कर सर्वोत्कृष्ट पद को प्राप्त कर गए। पूर्वभव के बैरी कमठ ने दस-दस भव तक शत्रुता का व्यवहार किया परन्तु उन्होंने हर बार अपने स्वभाव को नहीं छोड़ा। जलवत् नम्रवृत्ति का पालन करते रहे। जो स्वयं में रहता है, उसे कभी दूसरों के द्वारा दिये जा रहे कष्टों और बाधाओं का अनुभव नहीं होता है। भगवान पार्श्वनाथ के जीव ने पूर्व भवों में स्वयं को जाना और स्वयं लीन हो गए, उन्हें कमठ के जीव द्वारा दिए कष्टों का अनुभव भी नहीं हुआ। भगवान पार्श्वनाथ का जीवन आचरण भव्य, जीवों के लिए अनुकरणीय है। भगवान पार्श्वनाथ ने स्वयं का ही उत्थान नहीं किया साथ में उनसे शत्रु भाव रखने वाले कमठ के जीव को भी उत्थान का मार्ग बता दिया। अन्त में वह कमठ का जीव भगवान के चरणों के आश्रय को पाकर सम्यकदृष्टि हो गया, वह भी निकट भव में मुक्ति को प्राप्त करेगा। इस अवसर पर धनगाव, थडोद, झांतला, बोराव, रावतभाटा, कांकरिया तलाई एवं अन्य नगरों के समाजजन उपस्थित थे। 

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