खरगोन। बड़वानी जिले में होली के त्योहार से ऐन पहले आदिवासियों के फागुनी उल्लास की रंगारंग झांकी पेश करने वाले पारंपरिक भगोरिया हाटों का सिलसिला शुरू होने वाला है। भगोरिया हाट खरगोन जिले के कसरावद, महेश्वर, बड़वाह, भीकनगांव, भगवानपुर, जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में लगाए जाते हैं। आदिवासियों की संस्कृति की चटख छटाएं निहारने के लिए इन हाटों में आदिवासी भीड़ उमड़ते हैं। हजारों लोगों की भीड़ वाले भगोरिया हाटों की रौनक इतनी ज्यादा होती है। कि ये हाट बड़े मेलों की तरह नजर आते हैं।
जनजातीय संस्कृति आदिवासी क्षेत्रों में भगोरिया हाट लगाने की परंपरा करीब सालों पहले शुरू होने के प्रमाण मिलते हैं। भगोरिया हाटों का सिलसिला होलिका दहन से हफ्ते भर पहले शुरू हो जाता है। आदिवासी पूरे साल भले ही किसी भी स्थान पर काम करें, भगोरिया हाटों में शामिल होने के लिए वे पूरे परिवार के साथ अपने गांव जरूर लौटते हैं। हजारों लोगों की भीड़ वाले भगोरिया हाटों की रौनक इतनी ज्यादा होती है कि ये हाट बड़े मेलों की तरह नजर आते हैं। आदिवासी टोलियां ढोल और मांदल पारंपरिक बाजा की थाप तथा बांसुरी की स्वर लहरियों पर थिरकते हुए इन हाटों में पहुंचती हैं। आदिवासी युवक-युवती पारंपरिक वेश-भूषा में बड़े उत्साह से भगोरिया हाटों में शामिल होते हैं। इन हाटों के लिए युवाओं-युवतीओ की कई टोलियों के ‘ड्रेस कोड भी तय होते हैं। ताड़ी ताड़ के पेड़ के रस से बनी शराब के बगैर भगोरिया हाटों की कल्पना भी नहीं की जा सकती। दूधिया रंग का यह मादक पदार्थ इन हाटों में शामिल आदिवासियों की मस्ती को सातवें आसमान पर पहुंचा देता है।