मनासा। कनिष्ठ आपूर्ति अधिकारी विनोद नागोरे अपने कार्यालय पर उपस्थित नहीं रहना व अपनी जिम्मेदारी से अपना कार्य नहीं करना अन्य जूते चप्पल की दुकान व चाय ठेका पर टाइम पास करना यही कार्य दिनभर में करते रहते हैं व अपना फोन भी समय पर नहीं उठाते हैं।
जो जानकारी सूत्रों से मिली है उसमें विनोद नागौरे ने निवास के लिए मात्र नाम मात्र पर मकान ले रखा है किंतु शाम होते ही अपने घर मंदसौर की तरफ निकल जाते हैं जबकि उनको मनासा में ही रहना चाहिए मनासा में कितनी जगह घरेलू सिलेंडर लाल टंकी का दुरुपयोग हो रहा मनासा में संचालित राशन की दुकानों से अपनी हफ्ता वसूली का भी कार्य कर रहे हैं।
इन सारे मामलो में जब इनकी शिकायत खाद्यय विभाग के उच्च अधिकारियों को होती हैं किंतु उच्च अधिकारी भी इनकी कोई भी जांच नहीं करते हैं जिससे ऐसा प्रतीत होता है की अधिकारियों का भी इन्हें वरदहस्त प्राप्त है साथ ही चर्चा तो यहा तक है कि सभी की मिलीभगत है और इसी के चलते इनकी मनमानी से इनको बढ़ाने का प्रयास करते हैं यह भी अपने आप में एक जांच का विषय है।
जो चर्चाये दुकान संचालको के मुंह से आमजन को सुनाई देती है उसमें यह कि साहब की बंदी समय पर अदा करो ओर दुकान दारी अपनी मर्जी से करो । इसमे यह बात बहुत ही स्पस्ट है की राशन की दुकानें प्रतिदिन 6 घण्टे तक खुलना अनिवार्य है लेकिन यहा मनासा में तो एक भी दुकान 3 घण्टे से ज्यादा कभी भी खुली हुई दिखाई नही देती है सुबह 9 से 12 बजे तक ही खुलती है जिससे यह बहुत ही साफ हो जाती है कि मनासा खाद्य अधिकारी आमजन के प्रति कितने गंभीर है ?।
अंदर खाने से तो यहा तक भी पता चला है कि यदि कोई इन अधिकारी महोदय के विरुद्ध शिकायत करता है या आरटीआई के तहत आवेदन लगाता है तो उन्हें धमकाते हुये आवेदन उठाने व शिकायत वापस लेने हेतु अनर्गल दबाव भी बनाते है।
साथ ही अपने क्षेत्र अधिकार से बाहर जाकर आरटीआई कार्यकर्ता के घर पर जाकर मनगढंत कागज मकान पर चस्पा करके जानकारी देने का हवाला दिखाते है जिसकी संबंधित आरटीआई कार्यकर्ता व शिकायत कर्ता को पता ही नही होती है।
आखिर एक कनिष्ठ खाद्य आपूर्ति अधिकारी यह सब कैसे कर सकता है और वरिष्ठ अधिकारी भी उसे बचाने का कार्य आखिर क्यों कर रहे है यह जांच का विषय है।
जिले के ईमानदार जिला कलेक्टर हिमांशु चंद्रा को इन मामलों को संज्ञान में लेते हुये इनकी जांच करवाना चाहिये जिससे कि दूध का दूध ओर पानी का पानी हो सके।
जानकारी के अनुसार तो यहा तक भी कहा जाता है कि इनका ट्रांसफर जब भी होता तो ये जु गाड कर एक माह के भीतर ही पुनः वापस लौट आते है इससे अंदाजा लगाया जा सकता है की कितना जमकर यह इस क्षेत्र में वसूली का मांझा सूत रहे है ।
राशन की दुकानों पर तो सामग्री की पर्ची भी नही दी जारही है जिसकी कई शिकायतें आपके पास लंबित है । बोर्ड पर कभी भी स्टॉक चस्पा नहीं किया जाता है जिसको लेकर कई बार समाचारो का प्रकाशन भी हुआ ।
वही साहब ने अपने कार्य को संचालित करने के लिये एक निजी सहायक भी रख लिया है जो कि एक प्राइवेट युवक है क्या महोदय आप इतने व्यस्त हो कि आपका कार्य एक प्राइवेट युवक करे ओर उसकी कोई जवाबदारी भी किसी कार्य को लेकर ना हो तो आप कैसे उसको अपने अधिकार दे सकते हो यह भी जांच का विषय है।
जहाँ एक ओर शाशन के साफ तौर पर निर्देश है कि जो जहाँ कार्यरत है वही मुख्यालय पर निवास करना अनिवार्य है ऐसे में यह विनोद नागोरे साहब तो काम होते ही पुनः मंदसौर अपने निवास की ओर लौट जाते है ।