नीमच। अलम के जुलूस के साथ रविवार शाम नीमच में मोहर्रम की ताजियादारी और अज़ादारी का शुभारंभ हो गया। लगभग 200 वर्षों से चली आ रही यह ऐतिहासिक परंपरा आज भी पूरी अकीदत, अनुशासन और धार्मिक श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। नीमच की ताजियादारी न केवल मध्यप्रदेश, बल्कि देश-विदेश तक अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। यहां निकलने वाले ताजियों और मोहर्रम के आयोजनों को देखने दूर-दराज़ से लोग पहुंचते हैं।
मोहर्रम के अवसर पर निकाला जाने वाला अलम केवल एक ध्वज नहीं, बल्कि हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के काफिले की बहादुरी, सच्चाई, वफादारी और कुर्बानी का प्रतीक माना जाता है। विशेष रूप से यह हजरत अब्बास अलमदार की शौर्यगाथा और वफा की याद दिलाता है, जिन्होंने कर्बला की जंग में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए, लेकिन अपने उसूलों से कभी समझौता नहीं किया।
रविवार शाम निकले अलम के जुलूस में बड़ी संख्या में अकीदतमंद शामिल हुए। जुलूस परंपरागत मार्गों से होकर गुजरा, जहां श्रद्धालुओं ने पूरी अकीदत के साथ अलम को सलाम पेश किया। जुलूस के दौरान शांति, अनुशासन और धार्मिक सौहार्द का वातावरण देखने को मिला।
नीमच की ऐतिहासिक ताजियादारी एक बार फिर कर्बला की अमर कुर्बानी, इंसानियत, भाईचारे और न्याय के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के लिए तैयार है। मोहर्रम के आगामी दिनों में शहर में विभिन्न धार्मिक आयोजन और ताजियों की परंपरागत गतिविधियां आयोजित की जाएंगी।