नीमच। “मेरे साथ कोई नहीं है... परिवार का कोई व्यक्ति नहीं आया।” 35 वर्षीय लालूराम के ये शब्द उसके अकेलेपन और पीड़ा को बयां कर रहे थे। मल्हारगढ़ तहसील के अमरपुरा निवासी लालूराम के पैर में गंभीर चोट लगी थी और हड्डी बाहर निकल आई थी। मनासा से रेफर होकर वह नीमच जिला अस्पताल पहुंचा, लेकिन उसके साथ कोई परिजन नहीं था।
मेडिकल कॉलेज के चिकित्सकों ने उसे तत्काल भर्ती कर उपचार शुरू किया। संक्रमण के खतरे को देखते हुए करीब ढाई महीने तक लगातार घाव की ड्रेसिंग और डिब्राइडमेंट किया गया। घाव ठीक होने के बाद पैर में रॉड डालने के लिए सर्जरी आवश्यक थी, लेकिन निराश्रित होने के कारण इम्प्लांट की व्यवस्था चुनौती बनी हुई थी।
समाजसेवी ने इम्प्लांट की व्यवस्था में किया सहयोग-
ऐसे समय में समाजसेवी निखलेश वर्मा ने आगे आकर इम्प्लांट की व्यवस्था में सहयोग किया। इसके बाद अस्थि रोग विभागाध्यक्ष डॉ. पुनीत कुमार आचार्य के नेतृत्व में डॉ. अतुल सोलंकी और डॉ. हिमांशु सुमन की टीम ने करीब ढाई घंटे की जटिल सर्जरी कर पैर में रॉड डाली। चिकित्सकों के अनुसार, करीब साढ़े तीन महीने के उपचार के बाद लालूराम की स्थिति में सुधार है। संक्रमण के लक्षण नहीं हैं और उसे अस्पताल से छुट्टी दी जा रही है।
इलाज के साथ मिला इंसानियत का सहारा-
लालूराम के लिए यह उपचार उस समय सहारा बना, जब उसके साथ अस्पताल में मौजूद रहने वाला कोई परिजन नहीं था। चिकित्सकों की संवेदनशीलता और समाजसेवी के सहयोग से उसका उपचार संभव हो सका।
इस पूरे मामले ने स्वास्थ्य सेवाओं में निराश्रित मरीजों के उपचार को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। खास तौर पर यह चर्चा का विषय है कि यदि नीमच मेडिकल कॉलेज का संचालन भविष्य में पीपीपी मोड पर होता है, तो ऐसे निराश्रित मरीजों के निशुल्क उपचार की व्यवस्था किस प्रकार सुनिश्चित की जाएगी।